सत्ता की बुनियाद तो झूठ पर है ,और बिना झूठ सत्ता संभव नहीं

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नित्यानंद गायेन

बिना झूठ राजनीति संभव नहीं. राजनीति में कूटनीति एक अनिवार्य तत्व है. कुटनीतिक झूठ बोलते हैं किन्तु उसे झूठ नहीं माना जाता है. प्रधान सेवक ने विपक्ष को झूठ बोलने की मशीन कहा है. उनकी बात सही भी है. राजनीति में सत्ता और विपक्ष झूठ तो बोलते ही हैं. किन्तु सवाल है कि देश के एक ऐसे प्रधानमंत्री ने यह बात कही है यदि उनके बीते चार साल के शासनकाल में उनकी बातें और वादों का आकलन किया जाये तो हजारों झूठ निकल आयेंगे. यहाँ अभी उनकी झूठ गिनाने का वक्त नहीं है न ही विपक्ष को कोई क्लीन चिट देने का कोई इरादा. किन्तु जो खुद झूठ बोलते हैं वे ही जब औरों को झूठा कहें तो हंसी आती है.

किसी भी दल का चुनावी घोषणा-पत्र उठाकर देख लीजिये आपको पता चल जायेगा किसने कितने झूठ बोले हैं अब तक. बात आज की नहीं है. यह बहुत प्राचीन परम्परा है. सच सत्ता को बर्दास्त नहीं और झूठ बिना सत्ता संभव नहीं . कहते हैं कि प्यार और जंग में सब जायज है. जहाँ सब जायज है वहां नैतिकता की कल्पना फिजूल है. महाभारत में द्रोणाचार्य की हत्या कैसे हुई थी याद है ? धर्मराज को भी झूठ बोलना पड़ा था. सलाहकार थे कृष्ण. सुकरात की मौत या ईसा की हत्या की कहानी पढ़ी होगी आपने. ऐसी अनगिनत कहानियां है सत्ता और सच के संघर्ष की.

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आज जो प्रधानमंत्री विपक्ष को झूठ बोलने की मशीन कह रहे हैं उनको याद नहीं कि उनके इस शासन काल में जिस किसी ने भी सच कहने का प्रयास किया उनको देशद्रोही कहा गया, गौरी लंकेश, कलबुर्गी की हत्या क्यों हुई ? ऐसे भी अनेक लेखक पत्रकार हैं जिन्हें रोज डराया जाता है, कई लोगों पर देशद्रोह के मामले दर्ज हैं. इतिहास में बदलाव की की कोशिश लगातर जारी है और बताया भी जा रहा है आजादी के बाद पहली बार सब कुछ हो रहा है.

सत्ताधारी दल के नेता, सांसद, विधायक और मंत्री क्या कहते हैं ? कोई कहता है जो प्रधानमंत्री की आलोचना करेगा उसका हाथ काट दिया जायेगा तो एक विधायक कहता है बुद्धिजीवियों को गोली मार देता यदि वह देश का गृहमंत्री होता तो. एक और नेता कहता है जो कोई उनकी पार्टी की आलोचना करेगा उसे फांसी देने की इजाजत मिलनी चाहिए ?

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आलोचना नहीं, तारीफ होनी चाहिए ! क्यों ? लोकसभा स्पीकर पत्रकारों को क्यों सलाह देती है कि अप्रिय सच कहने से बचना चाहिए ? ऐसे में हरिश्चन्द्र कहाँ से ले आये ? दरअसल झूठ सत्ता और राजनीति की वह आदत है जो कभी नहीं जाती. यहाँ दूध का धुला कोई नहीं है. दाग सबके दामन पर है. यह भी सत्य है कि विपक्ष से ज्यादा झूठ सत्ता बोलती है. जिनको अपने सच्चे होने का इतना यकीन है वह कभी प्रेस कान्फ्रेंस नहीं करता. सिर्फ मन की बात सुनाते आ रहे हैं. कभी हमारी भी सुनिए और जवाब दीजिये तब पता चले. अब यह मत कहिये फिर से कि सवाल पूछना अच्छी आदत नहीं है.

सत्ययुग की कल्पना एक भ्रम है , ऐसा कोई युग कभी था ही नहीं.

 
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