गीदड की सौ साल की ज़िंदगी से शेर की एक दिन की ज़िंदगी बेहतर है:टीपू सुल्तान

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पैदाइस नवम्बर 1750 को कर्नाटक के देवनाहल्ली (यूसुफ़ाबाद) (बंगलौर से लगभग 33 (21 मील) किमी उत्तर मे) हुई थी। उनका पूरा नाम सुल्तान फतेह अली खान शाहाब था, उनके वालिद का नाम हैदर अली और वालिदा का नाम फ़क़रुन्निसा था, उनके पिता हैदर अली मैसूर साम्राज्य के सैनापति थे जो अपनी ताकत से 1761 में मैसूर साम्राज्य के शासक बने, टीपू को मैसूर के शेर के नाम से जाना जाता है, योग्य शासक के अलावा टीपू एक विद्वान, कुशल़ य़ोग़य सैनापति और शायर भी थे। एक देशभक्त और महान स्वतंत्रता सेनानी थे*

मगर इन सबके उलट कुछ नफरती झूठे लोग टीपू सुल्तान को हिंदुओं का दुश्मन व क़ातिल बताते हैं,

ईस्ट इंडिया कंपनी को सबसे पहले पराजित करने वाले भारत के महान योद्धा टीपू सुल्तान के बारे में नफरती लोगों का कहना है के वो हिंदू विरोधी थे, क्यों कि उन्होंने बहुत से पेशवाओ का क़त्ल किया था !
नफरतियों ने तो बता दिया कि टीपू सुल्तान ने पेशवाओ का क़त्ल किया परंतु यह क्यों नहीं बताया कि सुल्तान ने कत्ल क्यों किया,
आइए जानते हैं सच्चाई क्या थी
टीपू सुल्तान हिंदू विरोधी होते तो उनकी सेना में जितनी तादाद में मुसलमान थे उतने ही तादाद में हिंदू न होते, पंडित पुरनैय्या टीपू का खास सलाहकार थे,
पेशवाओ की हत्याएं करने का जो आरोप टीपू सुल्तान पर है वह त्रावणकोर राज्य में है,
जहाँ का मनुवादी राजा एक ऐय्याश और निरंकुश राजा था और उसके जुल्मों से वहाँ की जनता से छुटकारा दिलाने के लिए टीपू ने उसपर आक्रमण किया और युद्ध में त्रावणकोर की सेना में शामिल सारे पेशवा मारे गये !

त्रावणकोर राज्य में एक प्राचीन परंपरा के अनुसार नंबूदिरी, नायर और दलित नादर जैसी जातियों की औरतों को अपने शरीर का ऊपरी हिस्सा ढांकना प्रतिबंधित था ,
नंबूदिरी औरतों को घर के भीतर ऊपरी शरीर को खुला रखना पड़ता था, वे घर से बाहर निकलते समय ही अपना सीना ढक सकती थीं, लेकिन मंदिर में उन्हें ऊपरी वस्त्र खोलकर ही जाना होता था !
नायर औरतों को अपना वक्ष खुला रखना होता था,

सबसे बुरी स्थिति दलित औरतों की थी जिन्हें कहीं भी अंगवस्त्र पहनने की मनाही थी, पहनने पर उन्हें सजा भी हो जाती थी !
एक घटना बताई जाती है जिसमें एक दलित जाति की महिला अपना सीना ढक कर महल में आई तो रानी अत्तिंगल ने उसके स्तन कटवा देने का आदेश दे डाला,

इस अपमानजनक रिवाज के अनुसार आदेश था कि “महल से मंदिर तक राजा की सवारी निकले तो रास्ते पर दोनों ओर नीची दलित जातियों की अर्धनग्न कुंवारी महिलाएं फूल बरसाती हुई खड़ी रहें” उस रास्ते के घरों के छज्जों पर भी राजा के स्वागत में औरतों को ख़ड़ा रखा जाता था। राजा और उसके काफिले के सभी पुरुष इन दृष्यों का भरपूर आनंद लेते थे !

इस अपमानजनक रिवाज के खिलाफ ही टीपू सुल्तान ने इसी अन्याय को समाप्त करने के लिए त्रावणकोर पर आक्रमण किया जिससे त्रावणकोर की सेना के तमाम लोग मारे गए !
जिसे आज पेशवाओ के वध के रूप में बताकर टीपू सुल्तान का विरोध किया जाता है और उन्हें हिन्दू विरोधी बताया जाता है जबकि इतिहास गवाह है कि टीपू सुल्तान ने हिंदुओं की भरपूर मदद की और उन्हें कई मंदिरों के लिए जमीन और निर्माण में रुपयों से मदद की,
मगर अफ़्सोस नफरती लोगों को यह सब रास ना आया,

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