ठग्स ऑफ हिंदुस्तान एक बड़े विषय पर हावी बम्बइया टोटके

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आमिर खान ने तारे जमीं पर, थ्री इडियट, लगान, पीके जैसी एक के बाद एक शानदार फिल्में देते हुए खुद की फिल्मों के प्रति जिज्ञासा पैदा कर दी थी। हालांकि ठग की नाकामयाबी के बारे में अपने सिनेमा के जानकार मित्रों से पहले ही सुन लिया था, लेकिन इस महत्वपूर्ण ऐतिहासिक विषय को निर्देशक ने कैसे देखा और उसके साथ क्या किया, इसे जानने के लिए फ़िल्म देखना जरूरी लगा।

एक दौर में ठग गुलाम भारत की बड़ी समस्या थे। अंग्रेजों द्वारा पारंपरिक काम-धंधों को नष्ट करने की वजह से बड़ी तादाद में नौजवानों ने लूट-मार के इस पेशे को अपना लिया था। उन दिनों व्यापार तथा तीर्थ यात्राओं के लिए लोग बड़े पैमाने पर पैदल आवागमन करते थे। उन्हें एकांत में लूटना तथा बगैर परिश्रम किये पैसा कमाने का यह तरीका लोगों को सुविधाजनक लगने लगा था। ठग उस समय लोगों के लिए जानलेवा समस्या तथा अंग्रेज शासकों के लिए गंभीर चुनौती बन गया थे।

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इतिहास के इस महत्वपूर्ण विषय पर एक यादगार फ़िल्म बन सकती थी, गांधी, बैंडिट क्वीन या गांधी माई फादर जैसी। मगर निर्देशक बाहुबली जैसी फ़िल्म बनाने के चक्कर में फंस गया, जिसमें एक दमदार हीरो, दो हीरोइनें, एक विलेन की जरूरत होती है। फिर वह एक नई बोतल में बॉलीवुडी टोटकों-फार्मूलों को एकत्रित करता है, जिसमें वह आईटम सांग, लड़ाई के दृश्य, शानदार लोकेशनों तथा बदले की आग को डालता जाता है। दर्शकों को भावुक करने के लिए अंग्रेजों से बदले तथा सत्ता की लड़ाई को वह देशभक्ति के मामले में बदल देता है। एक अलग तरह के विषय में देशभक्ति के मसाले को मिक्स करने के चक्कर में फ़िल्म कन्फ्यूज हो गई और दर्शक ठगा रह गया।

निर्देशक भूल गया कि देशभक्ति के इस वृत्तान्त को हिन्दी के दर्शक कई फिल्मों में कई रूपों में देख चुके हैं। उसके जेहन में क्रांति, उपकार, पुकार, मर्द, लगान जैसी फिल्मों की याद आज भी बनी हुई है। ठग के रूप में आमिर का किरदार बहुस्तरीय है तथा मनोरंजन करता है। अमिताभ पहली बार कट्टपा जैसे किरदार के रूप में असर छोड़ने में नाकामयाब रहे। क्लाइव के किरदार को उसकी ऐतिहासिकता के विरुद्ध जिस फूहड़ता से चित्रित किया गया, वह भी निराश करता है।

कुल मिलाकर बॉलीवुड के निर्देशकों को चाहिये कि जितनी जल्दी हो सके, वे अपने फार्मूलों-टोटकों से मुक्त होकर यथार्थ की जमीन पर खड़े हों। उन्हें समझना होगा कि आज का दर्शक पुराने दौर की तरह भावुक नहीं है तथा वह अपने देश-समाज की सच्ची तस्वीर देखना चाहता है। वह नए विषयों के साथ, नए तरह के ट्रीटमेंट को पसंद कर रहा है। ठग जैसी फिल्मों की असफलता भी निर्देशकों के लिए सबक हो सकता है।

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