राजनीति आपके बच्चों को दंगाई बनाने पर उतर आई है

रवीश्‍ा कुमार 

दिल्ली को दिल्ली ही बनने नहीं देती है। कारों ने दिल्ली तक पहुंचने के सारे रास्ते बंद कर दिए हैं। सरकते-सरकते चलने के भय से हम लोग आज सुबह-सुबह साकेत के लिए निकल पड़े। कार पार्किंग का जुगाड़ करना था तो एम जी एफ मॉल पहुंचे। वहां दिखा किरण नादर म्यूज़ियम। सुना था मगर देखा पहली बार। काम निपटा कर दोबारा यहां पहुंचा और किरण नादर के अंदर गया। एक अनजान दुनिया हमारे देख गए अनुभवों को चुनौती देने के लिए चुपचाप हमारा इंतज़ार कर रही थी। फिल्म और वीडियो आर्ट।

एक निर्जन कमरे में सफेद पर्दे सा वीडियो चुपचाप चल रहा था। यह एक फिल्म है। एक ही फ्रेम और एक ही शॉट की हुई फ़िल्म। नीचे पोस्ट किए गए तस्वीरों में नाव चलाती जिस स्त्री को आप देख रहे हैं, वह नेहा चौकसी हैं। कलाकार और किरदार भी। कोई कलाकार ख़ुद को कलाकार बनाकर ऐसे रोमाचंक प्रयोग कर रहा है, यह देखना ही लगा कि हम सबने इन दंगाई नेताओं को देखते-देखते अपने देखने के साथ क्या कर डाला है। आइसबोट नाम है इस अभिव्यक्ति का। इसके लिए नेहा बरसाती से सादे लिबास में एक काल्पनिक संप्रदाय की भक्तिन बनती हैं।

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फ्रेम में समंदर सा विस्तार मगर यह एक झील है। महाराष्ट्र के लोनावाला की पावना झील। अपनी बनाई बर्फ की बनाई नाव में नेहा चौकसी खेवनहार भी हैं। चप्पू चला रही हैं। नाव चल रही है। पानी को नाव के आकार में जमा लिया गया था। बर्फ की मोटी सिल्ली नाव सी बन गई थी। धीरे-धीरे बर्फ की नाव पिघलती जाती है। नाव पिघलते-पिघलते फ्रेम के कोने में पहुंचती है और पानी में विलीन हो जाती है। नदी का विस्तार रह जाता है। पानी आसमान की तरह लगता है। बर्फ जा चुकी है। पानी और नाव एक दूसरे में विलिन हो जाते हैं। नेहा बची रह जाती हैं। मुझे यकीन है कि इसे देखते हुए आप कल्पनाओं में डूब जाएंगे। ये कौन लोग हैं जो ऐसा जीवन जी जाते हैं।

नेहा की 13 मिनट की फिल्म देखने के बाद हम लोग दूसरे कमरे में गए। बड़ा सा कमरा, पर्दा और बड़ा हो गया है। 70 एम एम के पर्दे के समान। 
होर्मुत्ज़ का नाम आपने सुना होगा। तेल के टैंकरों के आने-जाने का यह जलमार्ग डाकू मुल्कों की निगाह में रहता है। ईरान का दावा है कि होर्मुत्ज़ उसका है, अमरीका भी दावा करता है। खाड़ी के देशों के तेल तक पहुंचने का यह रास्ता जिसके कब्ज़े में होगा, तेल के काराबोर में उसका भी हिस्सा होगा। धरती पर यह छोटा सा एक टुकड़ा है मगर कैसे तेल के धंधे पर कब्ज़े की नीयत ने इसे बर्बाद किया है, इसे वीडियो पर उतारा है पाकिस्तान में जन्मी शाहज़िया सिकंदर ने। शाहज़िया न्यूयार्क में रहती है। आप सभी को उनकी यह अभिव्यक्ति देखनी चाहिए। उस पर पहली ग्लोब के आकार में चिड़ियों का झुंड सा दिखता है। फिर वह बिखरता हुआ आसमान बनता है और उसके बाद समदंर। होर्मुत्ज़ बनता है। हॉल में तरह तरह की आवाज़ें भी तैर रही हैं। गोलियों की आवाज़ है। मस्जिद के अज़ान की आवाज़ है। गानों की आवाज़ है। बहुत सारी आवाज़ें हैं मगर पर्दे पर सबकुछ धीरे धीरे बदलता है।

कभी तेल की पाइप लाइन दिखती है तो कभी तेल कारखानों के कल-पुर्ज़े तो कभी कटे हुए हाथ, लाश, ख़ून और फिर सब जब मिलकर काग़ज़ के हवाई जहाज़ से बनकर तैरने लगते हैं, तब पता चलता है कि होर्मुत्ज़ पर कब्ज़े की सनक ने बम बरसाने वाले विमानों को खिलौना बना दिया है। 15 मिनट की इस फिल्म को देखना चाहिए। देखना सिर्फ आंख की क्रिया नहीं है। जब आखिरी सीन तक आते आते दो लाशें एक दूसरे से ख़ींच कर अलग कर दी जाती हैं तब शाहज़िया के इस रूपक को समझने के लिए आपको यहां की त्रासदी को जानने के लिए प्रस्थान करना पड़ता है।

हम समझते हैं कि दिल्ली में अब वक़्त नहीं है। यहां के रास्ते सारा वक्त खा जाते हैं फिर भी इस म्यूज़ियम में गुज़ारा हुआ आधा घंटा अच्छा रहा। टीवी ने हमारे देखने के सारे अनुभव सीमित कर दिए हैं। उन्हें फिर से मांजना हो तो इस प्रदर्शनी को देख सकते हैं जिसे रूबीना करोड़े ने क्यूरेट किया है। मैं जिनका नाम लिख रहा हूं उनके बारे में कुछ नहीं जानता। मगर उन्होंने अपना काम इस ख़ूबी से ही किया है कि आप उनके बारे में कम जानें और उनके काम के ज़रिए ख़ुद को जानें और उस सभ्यता को समझिए जिसका विस्तार हमने युद्ध और हिंसा की भाषा से किया है। आखिरी तस्वीर में आप देखेंगे कि बहुत सी इमारतें खड़ी हैं। चार कोने में कचरे के पहाड़ हैं। हवा ख़राब है। ये आपका शहर है। ऑपरेशन थियेटर के बाहर जल रहे लाल बल्ब की तरह है। हम सब शहर में नहीं ऑपरेशन थियेटर में रहते हैं। कारों की आवाज़ें कान चीर रही हैं, हवा फेफड़े को चीर रही है और पानी आंत को। इस प्रदर्शनी का नाम है DELIRIUM/EQUILIBRIUM

अच्छा हो कि आप ख़ुद देखें और अगर आपके बच्चे थोड़े बड़े हो गए हैं तो उन्हें ले जाएं। वे समझ पाएंगे कि फिल्म और वीडियो के पर्दे पर क्या क्या रचा जा सकता है। शाम को हिन्दी न्यूज़ चैनल देखना बंद कीजिए। राजनीति आपके बच्चों को दंगाई बनाने पर उतर आई है। डाक्टर बनाना है तो टीवी बंद कर दीजिए। जब आप नेहा चौकसी और शाज़िया सिकंदर का वीडिया आर्ट देखेंगे तो पता चलेगा कि मैं क्यों कह रहा हूं। आज ख़ुद ख़ुश हूं कि कई सारे नए कलाकारों के बारे में जाना। उनके काम को देखा। मेरी ज़िंदगी की सूची में 15-16 ऐसे कलाकार जुड़ गए जो दुनिया के कई मुल्कों से अपनी कला लेकर यहां आए हुए हैं। किरण नादर म्यूज़ियम फॉर आर्ट 145, साउथ कोर्ट मॉल, साकेत में है। प्रवेश निशुल्क है।

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