झंडे के रंग से नहीं मार्च को किसानों की रंगत से देखिए

रवीश कुमार

किसान मार्च में सबको एक ही रंग दिखा। एक ही रंग की राजनीति दिखी। लेकिन दो सौ संगठनों के इस मार्च में झंडों के रंग भी ख़ूब थे। योगेन्द्र का स्वराज इंडिया पीला-पीला हो रहा था तो राजू शेट्टी का शेतकारी संघटना हरा और सफ़ेद लहरा रहा था। तेलंगाना रैय्य्त संघ का झंडा हरा था। तमिलनाडु के जो किसान निर्वस्त्र होकर प्रदर्शन कर रहे थे उनका झंडा और गमछा हरा था। सरदार वी एम सिंह का राष्ट्रीय किसान मज़दूर संगठन लाल सफ़ेद और हरे रंग के झंडे के साथ आगे चल रहा था। आसमानी रंग का भी झंडा देखने को मिला। देश के कई इलाक़ों से आए किसान सिर्फ लाल या हरा झंडा लेकर नहीं आए। वहाँ किसी को एक रंग का प्रभुत्व दिखता होगा मगर कई तरह की बोलियाँ थीं। वैसे लोग थे जो सोशल मीडिया और टीवी के ज़माने में दिखने वालों के जैसे नहीं लगते थे। बहुत से ऐसे थे जो हममें से कइयों से हाल फ़िलहाल के अतीत की तरह नज़र आ रहे थे। समस्याओं का अंबार लगा था। हर समस्या को सुनकर दिलो दिमाग़ में लाल बत्ती ही जलती थी। लाल बत्ती कम्युनिस्ट नहीं होती। ख़तरे का निशान कम्युनिस्ट नहीं होता। एक किसान से पूछा तो कहा कि जब भी हम भू अधिग्रहण के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ते हैं तो लाल पार्टी ही आती है। हम तो उन्हें वोट भी नहीं देते मगर आते वही हैं। अब कोई आता नहीं तो हम किसान सभा का झंडा लेकर आए हैं। सवाल है कि इन चार सालों में मुख्यधारा की किस पार्टी ने किसानों की लड़ाई लड़ी है? इसमें कुछ दलों के झंडे नहीं थे। कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा, रालोद, राजद, जदयू, आप, तृणमूल, अकाली। क्या किसान इन्हें वोट नहीं देते हैं? इन्हीं को तो देते रहे हैं।

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