वरुण गांधी की किताब A RURAL MANIFESTO पर रवीश कुमार की टिप्पणी

इस किताब को हाथ में लेते ही झटका लग गया। मुझे लगा कि कोई पतली सी किताब होगी मगर आठ सौ पन्नों की किताब हाथ में आते ही लगा जैसे लेखक ही डाल से कंधे पर झूल गया हो। एक सक्रिय सांसद की इतनी मोटी किताब? वो भी सिर्फ भारत के गाँवों पर? आज के कितने सांसदों में यह साहस और धीरज होगा कि वह रूरल मेनिफेस्टो लिखकर अपनी समीक्षा के लिए लोगों के बीच हाज़िर हो जाए। वरुण गांधी के लेख पढ़ता रहा हूँ मगर ग्रामीण जीवन के तमाम पहलुओं को लेकर वो एक गंभीर किताब पर काम कर रहे हैं, इसकी भनक तक नहीं लगने दी। रूपा प्रकाशन से यह किताब आई है। 995 रूपये की है। मैंने पढ़ी नहीं है।

मगर सरसरी तौर पर पन्नों को पलट कर लगा कि वरुण ने कुछ कमाल किया है। खेती किसानी पर बात करने वालों के बीच एक दस्तावेज़ रख दिया है। एक चुनौती भी कि इस समग्रता से बहस का आग़ाज़ हो, ख़ासकर तब जब खेती बहस के केंद्र में हैं। पन्नों पर बिखरे आँकड़े और ग्राफ़िक्स बता रहे हैं कि यह किताब अनुभवों और संस्मरणों की मामूली किस्सागोई नहीं है। अभी तक बाहरी रूप देखकर ही हतप्रभ हूँ। क्या कोई हमारे बीच गाँवों को समझने वाला नेता आया है ? जिसे हम पब्लिक स्पेस में देख तो रहे थे, पढ़ भी रहे थे लेकिन यह नहीं जान सके कि वह गाँवों को लेकर इतना कुछ सोच रहा है।

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