वैश्विक पूंजी की चमक के साथ देसी सर पर फुगाटी का जूता

मनीष वैध

इसी शीर्षक से ‘समावर्तन’ के ताज़ा दिसम्बर 18 अंक में सुपरिचित युवा आलोचक राजेश सक्सेना ने ‘फुगाटी का जूता’ की तरतीब से समीक्षा की है। इसका एक अंश यहाँ भी, संभव हो तो आप भी पढिएगा..

“विगत दिनों युवा कथाकार मनीष वैद्य के नवप्रकाशित कहानी संग्रह की कहानियों में से गुजरते हुए यह महसूस हुआ कि इनकी कथावस्तु भारतीय ग्राम्य जीवन के हर उस आयाम की पड़ताल करती है जो आज़ादी के बाद भी मुख्यधारा के केंद्र में नहीं लाए गए, बल्कि ग्रामीण लोक जीवन में वहाँ की नागरिक सभ्यता ने जो कुछ जीवन मूल्य अपने लिए विकसित किए उनमें निरन्तर एक क्षरण, विकास के आधुनिक तमाशे के जरिये सत्ताओं द्वारा किया जाता रहा, जिसके प्रतिफलन में आज वह ग्राम्य संस्कृति हांफती नज़र आ रही है ! निश्चय ही यह शुभ संकेत नहीं है, मनीष वैद्य इन संकेतों की पहचान करते हुए अपने समय और समाज की ज़िम्मेदारी के प्रति अपनी रचनात्मकता को एक सार्थक आकार देने का प्रयत्न इन कहानियों में करते हुए नज़र ही नहीं आते बल्कि सवाल भी करते हैं ! ग्राम्य जीवन में प्राय: हम सभी का वास्ता रहा, हर लेखक के भीतर आपने गाँव की छवियाँ हैं….. “

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