नोटा कहो या सोटा पर भाजपा तो हारी ही है बहाना मत बनाओ

शंभूनाथ शुक्ल

अब आप नोटा की वजह से हार बताओ या कोई और बहाना तलाशो, लेकिन इसमें शक नहीं कि जनता के ऊपर से मोदी का जादू अब असर नहीं कर रहा। 2013-14 का खुमार अब उतर रहा है, वर्ना क्या वजह रही कि इतनी रैलियों और धुआंधार प्रचार के बावजूद भाजपा मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ और राजस्थान कि विधानसभाओं में कांग्रेस के मुक़ाबले हार गई। देश को कांग्रेस मुक्त करने का भाजपा का सपना बस ख्वाब ही बनकर रह गया। छत्तीसगढ़ में तो भाजपा को करारी शिकस्त मिली तो राजस्थान में भी महारानी अपना ताज बचा नहीं सकीं। मध्यप्रदेश में कांग्रेस बहुमत का आंकड़ा भले न छू पाई हो, पर उसने भाजपा के शिवराज सिंह चौहान को पीछे तो कर ही दिया। और उधर बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने दो विधायकों को सरकार बनाने के लिए कांग्रेस का समर्थन करने की घोषणा कर मध्यप्रदेश को भी भाजपा के हाथ जाने से रोक लिया। इस तरह से 2019 के लोकसभा चुनाव के कुछ ही महीने पहले हुए इन विधान सभा चुनावों में कांग्रेस ने साबित कर दिया है कि हिन्दी पट्टी में मतदाता अब कोई भाजपा का ज़रखरीद गुलाम नहीं है। भले ही कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को यह साबित करने के लिए जनेऊ पहनना पड़ा हो या अपना गोत्र बताना पड़ा हो, लेकिन वे हर तरह से भाजपा के पर कतरने में कामयाब रहे। राजनीति में अच्छा-बुरा कुछ नहीं होता, बस चुनाव जीतना ही एकमात्र मकसद होता है, इस तरह से चीजों को लें तो हम कह सकते हैं कि राहुल गांधी इस इम्तहान में पास हो गए। ज़ाहिर इससे कांग्रेस का मनोबल तो बढ़ा ही, खुद भाजपा के अंदर भी मोदी विरोधियों की आवाज़ को ताकत मिली।

नोटा को हार की वजह बताने वालों का तर्क है कि नोटा के खाते में इतने अधिक वोट चले गए कि भाजपा को हारना पड़ा। लेकिन अगर उनकी ही बात को सही माना जाए तो भी यह तो कहा ही जाएगा कि मतदाता का भाजपा से भरोसा उठ चला है। नोटा में वोट सरकार से नाखुश लोगों का गया। भले ही ये नाखुश लोग कांग्रेस को प्रत्यक्ष तौर पर वोट न कर रहे हों लेकिन परोक्ष रूप से यह संकेत तो दे ही दिया कि भाजपा में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है। मौजूदा प्रजातांत्रिक स्वरूप में उन्हें यह भी पता ही होगा कि नोटा को वोट कर उन्होने अपना ‘नकार’ जताया तो है, लेकिन यह नकार नुकसान तो सरकार चला रही पार्टी के लिए ही हुआ। क्योंकि लोकतन्त्र में जिस किसी भी पार्टी को कुल पड़े वैध मतों का सबसे अधिक हिस्सा मिला, वह जीती हुई मानी जाएगी। फिर नोटा तो बेमानी हो गया। वैसे इससे यह भी पता चलता है कि कि सरकार से नाराज़ होकर ही मतदाता नोटा की शरण लेता है। मज़े की बात कि मध्य प्रदेश में नोटा को वोट करने का आह्वान स्वयं भाजपा वाले ही कर रहे थे। उन्हें लग रहा था कि भाजपा से नाराज़ जो वोट कांग्रेस को जाएगा, वह दिग्भ्रमित हो जाएगा और उसका अपना कोर वोट तो उसे मिलेगा ही लेकिन उसका यह दाँव भी उल्टा पड़ गया।

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लोकतन्त्र में सत्तारूढ़ दल की ज़िम्मेदारी बनती है, कि वह सारी लोकतान्त्रिक संस्थाओं का सम्मान करे और ताक़त को ऊपर से नीचे तक डेलीगेट करे। अतीत गवाह है कि जिस किसी ने भी तानाशाह बनाने की कोशिश की फौरन जनता उसको अगले ही चुनाव में चित कर देती है। इन्दिरा गांधी का उदाहरण हमारे सामने है। लेकिन भाजपा को 2014 में जनता ने जिस प्रचंड बहुमत से जिताया, प्रधानमंत्री जी उसका सम्मान नहीं कर सके। उनका एकमात्र ध्येय देश को कांग्रेस मुक्त करना रहा, और इस चक्कर में वे सदैव चुनावी मोड में रहे। विगत साढ़े चार वर्षों में एक भी दिन ऐसा नहीं गुजरा, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस और इसी बहाने जवाहरलाल नेहरू तथा इन्दिरा गांधी एवं उनके वंशजों को न कोसा हो। वे राहुल गांधी और उनकी माँ सोनिया गांधी के विरुद्ध अशोभनीय टिप्पणियाँ करते रहे। नतीजा यह रहा कि बार-बार उनका नाम लेकर उन्होंने अनजाने ही राहुल गांधी को इस ऊंचाई पर पहुंचा दिया कि उन्हीं के दिए शब्दों के आधार पर कहा जाए तो स्पष्ट है कि ‘पप्पू’ ने उन्हें हरा दिया। अब इससे वे सबक लेते हैं तो ठीक, वर्ना 2019 कि नैया आसान नहीं। इस तरह से विधवाओं (राहुल कि माँ सोनिया गांधी और दादी इन्दिरा गांधी) को कोसते-कोसते वे खुद ही अपने बयानों की दरिद्रता दिखाते रहे।

वे खुद चुनावी मोड में रहे, इस वजह से उनकी पार्टी भी इसी काम में लगी रही और उसने अपना कोर बैंक बढ़ाने के लिए लुंपेन तत्त्वों को बढ़ावा दिया। ऐसे लोग, जो “नॉन स्टॉप” गालियां दे सकें और हिन्दू धर्म तथा गाय की रक्षा के नाम पर अराजकता फैला सकें, को खूब बढ़ावा दिया गया। उत्तर प्रदेश में गौतम बुद्ध नगर ज़िले में एक मुस्लिम युवा अखलाक की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी गई क्योंकि उसके घर के फ्रिज में कथित रूप से गोमांस रखा था। इसी तरह राजस्थान में शंभू रैगड़ ने खूनी खेल खेला, हरयाणा और राजस्थान की सीमा पर गाय लाते पहलू खान नाम के एक व्यक्ति को मार दिया। और अभी पिछले दिनों ऐसी ही उन्मादी भीड़ ने गाय का नाम लेकर उत्तर प्रदेश पुलिस के एक इंस्पेक्टर को मार दिया। मज़े की बात कि ऐसी अराजकता पर क़ाबू पाने की बजाय वहाँ की सरकारें, यह पता करती रहीं कि आखिर गाय किसने मारी। जैसे आदमी और गाय के बीच चले इस छाया-युद्ध में आदमी की हत्या सही हो। कोई भी सरकार ऐसी स्थिति में कैसे चल पाएगी। लेकिन प्रधानमंत्री ऐसी हरकतों पर संबंधित राज्य सरकारों से पूछताछ करने की बजाय देश को कांग्रेस मुक्त कराने के प्रयास में लगे रहे।

यद्यपि आंकड़े अभी भी जताते हैं कि नरेंद्र मोदी इस देश में सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं। लेकिन यह भी सच है कि अब वह बात नहीं रही, जो पाँच वर्ष पूर्व थी। तब वे यूपीए सरकार के प्रधानमंत्री डॉ॰ मनमोहन सिंह से बहुत आगे थे। किन्तु आज राजनीति में उनके समक्ष नवयुवा राहुल गांधी उनका विकल्प बन कर उभर रहे हैं। यह सच है कि मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में प्रधानमंत्री ने जितनी रैली कीं उसके अनुरूप उन्हें ज्यादा सीटें मिलीं, जबकि राहुल उनके पीछे रहे। मगर प्रधानमंत्री यदि इसी तरह अपनी पार्टी के अराजक नेताओं पर क़ाबू नहीं पा पाए तो 2019 में बहुमत का आंकड़ा तो दूर भाजपा के लिए 200 सीटें पाना भी आसान नहीं होगा। उन्हें खुद भी सोचना होगा कि सरकार का काम होता है, अराजकता पर काबू पाना। सभी संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान बहाल रखना। और जनहित के काम करना। लेकिन मोदी जी के खाते में दर्ज़ है एक हज़ार और 500 के नोट अचानक बंद कर देना। इससे जनता में त्राहि-त्राहि मच गई थी। ये नोट उन गरीबों के पास भी थे, जो झुग्गी-झोपड़ियों में रहते हैं। और वे इन्हें बदलवा तक नहीं पाए। आपने कहा इससे काले धन पर अंकुश लगेगा, लेकिन आपने एक हज़ार के बदले दो हज़ार का नोट ला दिया। नतीजा सिफर। काला धन जिनके पास था, उनको छुपाने का एक और विकल्प मिल गया। आप जिस जीएसटी को लाए, उसका सर्वे नहीं किया गया, और व्यापारियों ने मंहगाई बढ़ा दी। तब फिर लाभ क्या हुआ?

अब केंद्र सरकार कि नज़र रिजर्ब बैंक के रिजर्ब पर है, इसके लिए रिजर्ब बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल से विवाद चल रहा था। उर्जित पटेल इस रिजर्ब कोष को सरकार को नहीं देना चाहते थे। मगर सरकार जनहित के नाम पर इसे मांग रही थी। उसका तर्क था कि यह कोष केंद्र सरकार का है, क्योंकि वही रिजर्ब बैंक कि सबसे बड़ी शेयर होल्डर है। संघर्ष का नतीजा यह निकला कि उर्जित पटेल ने इस्तीफा दे दिया। और अब जिन शशिकांत दास को रिजर्ब बैंक का गवर्नर बनाया गया है, वे अर्थ शास्त्री नहीं एक सामान्य नौकरशाह हैं। यह सरकार की विफलताओं का ही संकेत है।

इसके अलावा प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को रोक नहीं पाए। और वे अपने बयानों से उनकी राह में कांटे बो रहे हैं। गाय, मंदिर तथा हिन्दुत्त्व को लेकर जिस तरह वे आक्रामक हैं, वह भाजपा को आमलोगों से दूर कर रही है। मुसलमानों को भाजपा ने यूं भी अपने वोटबैंक से बाहर कर रखा है। उधर पार्टी गाय को लेकर अपनी हठधर्मिता से किसानों को अपने दूर कर रही है। किसान गाय और उसके बछड़ों को लेकर परेशान हैं। बूढ़ी गाएँ किसान के लिए बोझ हैं, क्योंकि दूध वे देती नहीं और उनके लिए चारे का इंतजाम करना उसके लिए बहुत खर्चीला होता है। इसके अलावा बछड़े अब कृषि के लिए अनुपयोगी हैं। क्योंकि कृषि का सारा काम अब मशीनों से होता है। ऐसे में बछड़े का किसान क्या करे। पहले वह इन्हें बेच देता था, पर अब गोरक्षकों के भाय से न तो कोई गाय-बैल बेचता है न ही खरीदता है। इसलिए वह इन्हें आवारा छोड़ देता है। चारागाहों कि व्यवस्था अब गांवों में है नहीं। नतीजन ये गाएँ किसान कि फसल नष्ट करती हैं। अब वह इन्हें मार भी नहीं सकता और सरकार उसकी इस पीड़ा की अनदेखी करती है। ये नाराजगी मोदी सरकार को 2019 में झेलनी ही पड़ेगी। अगर नरेंद्र मोदी ने इस दिशा में कुछ नहीं किया तो 2019 की राह आसान नहीं रहेगी। फिर भले ही और ढेर सारे वोट ‘नोटा’ को जाएँ, मौजूदा सरकार की वापसी बहुत ही मुश्किल होगी। यही हाल मंदिर का है। कोई भी हिन्दू अब मंदिर को लेकर कतई रुचि नहीं दिखा रहा, लेकिन योगी आदित्यनाथ इसे मुद्दा बनाने कि फिराक में हैं। योगी जी ने हनुमान को दलित बताकर एक और विवाद पैदा कर दिया है, जिसकी वजह से हिन्दू समाज में ही दलित बनाम गैर दलित का मामला तूल पकड़ता जा रहा है।

यह सच है कि नरेंद्र मोदी की राह बहुत कठिन है। उन्हें कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों से लड़ने और व्यर्थ में ऊर्जा खर्च करने कि बजाय अपनी पार्टी के ही बयान-बहादुर नेताओं और लुंपेन तत्त्वों से छुटकारा पाने के उपाय तलाशने चाहिए।

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