डाउन टू अर्थ का हिन्दी संस्करण पढ़ा करें, चैनल देखना बंद करें

उम्मीद है आप समझ पा रहे होंगे कि न्यूज चैनल देखने से न तो आप कुछ जानते हैं और न समझते हैं। इस सवाल से भिड़ने की ऊर्जा है तो हिन्दी डाउन टू अर्थ पत्रिका में कुंदन पाण्डेय की इस लंबी रिपोर्ट को पढ़िएगा। किस तरह देश भर में आदिवासी और अनुसूचित जाती को और ग़रीब बनाए रखने के लिए गाँवों की सामुदायिक ज़मीन पर क़ब्ज़े की तैयारी चल रही है। सुप्रीम कोर्ट की आँख में धूल झोंक कर भूमि बैंक बनवा रही है ताकि इन ज़मीनों को लेकर उद्योगों को दे दिया जाए। पंजाब में बालदकलां गाँव के दलितों ने ज़बरदस्त आंदोलन चलाया। उनके पास ज़मीन नहीं थी। न ही मवेशी के लिए चारे की जगह। ग़रीबी मार रही थी। जो शमिलात, ग़ैर मजरुआ या सामुदायिक ज़मीन होती है उसकी बोली लगती थी। हमेशा संपन्न् किसान बोली में ज़मीन ले लेते थे। दलितों ने मिल कर पैसा जमा किया और बोली लगाई। ज़मीन लेकर आपस में बाँट लिया। लोगों की आमदनी पढ़ने लगी। एक मवेशी से तीन मवेशी हो गए।

शानदार कहानी है। अब इसे कुचलने के लिए उसी गाँव में फ़ूड पार्क बनाने का सर्वे हो रहा है ताकि जो हासिल किया है वो फिर से हड़प लिया जाए। मगर यह रिपोर्ट पंजाब से लेकर झारखंड में ज़मीनों की लूट का जो नक़्शा खींचता है वह भयावह है। सिर्फ इसी एक मसले पर एक महीना चैनलों पर रिपोर्ट हो जाए तो करोड़ों लोगों की ज़िंदगी बदल सकती है। न्यूज चैनल ऐसा नहीं करेंगे। लोगों की लड़ाई को हतोत्साहित करेंगे और दिन रात मोदी बनाम राहुल की फ़र्ज़ी लड़ाई के बहाने मोदी का प्रोपेगैंडा करेंगे।

आप डाउन टू अर्थ ख़रीदा करें। अच्छी भाषा है। अच्छी रिपोर्ट होती हैं। मैदान में जाकर मेहनत और शोध से की गई रिपोर्ट। पत्रकारिता को बचाने के लिए आपका बहुत मामूली योगदान होगा। अगर पत्रकारिता में आस्था न होती और इसकी ज़रूरत न होती तो लोग लगातार मुझे क्यों फोन करते? जानते हुए कि टीवी में पत्रकारिता समाप्त हो चुकी है। कई मूर्ख लोग जब यह कहते हैं कि मीडिया नहीं दिखा रहा तो उनसे यही कहता हूँ कि अभी तक आपको चैनलों में दिखाई क्या दे रहा था? देख क्या रहे थे? कद्दू !

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