देश की आवाज़ बनने वाली दादी के जलवे ,दिल्ली के गलियों से निकलकर विश्वमंच तक पहुंची दबंग दादी

दिल्ली की संकरी गलियों से निकलकर बिलकीस बानो का नाम आज विश्व मंच तक पहुंच गया है। ये वो ही बिलकीस बानो हैं जो नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में देश की आवाज़ बनी थी,और देश भर में शाहीन बाग की दादी के नाम से मशहूर हुई थी। अपने अडिग फैसले और कमाल के आत्मविश्वास ने उन्हें आज दुनिया के 100 सबसे शक्तिशाली लोगों में दर्जा दिलवा दिया है।
82 साल की बिलकिस बानो जिस तरह कड़कती ठंड और बरसात में दिन रात शाहीन बाग़ में बैठी रही वो वाक़ई में एक मिसाल है। लोगों ने उन्हें बहुत समझाया कि उनकी उम्र इस तरह प्रदर्शन के लिए बैठने की नहीं है,वो बीमार हो सकती हैं लेकिन उनका फैसला पक्का था। उनका कहना था कि मौत तो आनी ही है,मौत से क्या डरना।
उनके इसी जज़्बे को देखते हुए टाइम्स मैग्ज़ीन ने उन्हें दुनिया के 100 शक्तिशाली लोगों में शुमार किया है।इस लिस्ट में नरेंद्र मोदी का भी नाम है।
बिलकीस दादी का कहना है की उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था की एक दिन वह दुनिया में इतना ऊंचा मुकान हासिल करेंगी।उन्होंने बताया कि वो कभी भी किसी विरोध प्रदर्शन में शामिल नहीं हुई लेकिन जब उन्होंने सुना कि नागरिकता संशोधन अधिनियम के कारण उनके बच्चों का हक़ छीने जाने की आशंका है तो बिना कुछ सोचे वह धरने पर बैठ गई।उन्होंने बताया कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि यह धरना एक क्रांति बन जाएगा जिसका ना सिर्फ देश में बल्कि दुनिया में बखान होगा।
उन्होंने नरेंद्र मोदी को बधाई देते हुए कहा कि “मोदी भी मेरे बेटे की तरह ही है।उसने मेरी कोख से जन्म ना लेकर मेरी बहन की कोख से जन्म लिया है। मैं चाहती हूं कि वो हमेशा खुश और सेहतमंद रहे।”
बिलकीस बानो का कहना है कि अगर कभी मोदी उन्हें मिलने के लिए बुलाएंगे तो वो ज़रूर जाएंगी।
बिलकीस बानो ने अपने एक इंटरव्यू में बताया कि शुरुआत में वह कुछ औरतों के साथ शाहीन बाग़ में दरियों पर बैठी रहती थी। धीरे-धीरे शाहीन बाग़ में प्रदर्शनकारियों की संख्या बढ़ने लगी। लोगों की तादाद देखकर कड़कड़ाती सर्दी में वहां गद्दे और तिरपाल लगाई गई। धीरे धीरे देश के विभिन्न हिस्सों से लोग शाहीन बाग में आने लगे। शाहीन बाग पूरे देश और दुनिया के लिए एक मिसाल बन गया था। और वहां का विरोध प्रदर्शन एक क्रांति के रूप में जाना जाने लगा। देश में जगह-जगह शाहीन बाग़ की तरह धरना प्रदर्शन शुरू हुआ।
उन्होंने बताया कि मैंने सोच लिया था कि जब तक मेरे बच्चों को उनका हक़ नहीं मिल जाता मैं यह धरना खत्म नहीं करूंगी चाहे मेरी जान ही क्यों ना चली जाए।
बिलकीस बानो पढ़ी-लिखी नहीं है लेकिन कई न्यूज़ चैनलों ने उनके इंटरव्यू लिए। बहुत बेबाकी के साथ वो पत्रकारों और सरकारी प्रतिनिधियों को कानून की खामियां गिनवाया करती थी। उन्होंने अपने इंटरव्यू में बताया कि उनका जन्म भारत में ही हुआ है और उनके पास उनके सब कागज़ात मौजूद हैं लेकिन उनकी लड़ाई ऐसे लोगों के लिए हैं जिनके पास शायद कागज़ ना हों। उन्होंने कहा कि ये लड़ाई संविधान को बचाने की है।
आज बिलकीस बानो का नाम सिर्फ देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी जाना जाता है और ये हम भारतीयों के लिए एक गर्व की बात है। साथ ही एक मिसाल भी है कि उम्र कुछ भी हो हमारा आत्मविश्वास हमें दुनिया में पहचान दिला सकता है।

(सुमरा परवेज़)

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