दिल्ली दंगों की जांच किसी निष्पक्ष एजेंसी से करवाई जाए: मंच अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब

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नई दिल्ली: जुनैद मलिक अत्तारी, दंगे फसाद इंसानियत के नाम पर कलंक हैं। धर्म, भाषा, मान्यताओं, रंग जैसी विषमताओं के साथ मत-विभाजन होना स्वाभाविक है। एकबारगी लगता हो कि दंगे महज किसी कौम या फिरके को नुकसान पहुंचाते हैं, असल में इससे नुकसान पूरे देश के विकास, विश्वास और व्यवसाय को होता है। जरूरत इस बात की है कि दंगों के असली कारण, साजिश को सामने लाया जाए तथा मैदान में लड़ने वालों की जगह उन लोगों को कानून का कड़ा पाठ पढ़ाया जाए जो घर में बैठ कर अपने निजी स्वार्थ के चलते लोगों को भड़काते हैं व देश के विकास को पटरी से नीचे लुढकाते हैं। इसी लिए आज जरूरी हो गया है कि दिल्ली दंगों की जांच की जांच किसी निष्पक्ष एजेंसी से करवाई जाए, यदि हाई कोर्ट के किसी वर्तमान जज इसकी अगुआई करें तो बहुत उम्मीदें बंधती हैं। अब बात करते हैं मुद्दे कि रिहाई मंच ने पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए 4 सितंबर को कहा कि दिल्ली दंगा हो या उत्तर प्रदेश सीए आंदोलन का पुलिसिया दमन, सरकारी मशीनरी के दुरूपयोग की गंध हर जगह मौजूद है। रिहाई मंच अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब ने कहा कि दिल्ली दंगों की जांच को लेकर अदालत द्वारा की जाने वाली टिप्पणियां हों या उत्तर प्रदेश के जनपद मऊ में आंदोलनकारियों पर लगाए गया रासुका का मामला, सत्ता के इशारे पर बेगुनाहों को फंसाने और दोषियों को बचाने की दास्तान बन चुकी है।इसी कड़ी में यूनाइटेड अगेंस्ट हेट के सदस्य खालिद सैफी ने शुक्रवार को दिल्ली की एक अदालत से कहा कि वह दिल्ली दंगों की साजिश मामले में (एफआईआर 59/2020) दायर चार्जशीट पर 20 लाख कागजात बर्बाद करने के लिए दिल्ली पुलिस के खिलाफ नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में मामला दर्ज करेंगे। प्रसिद्ध लीगल वेबसाइट, लाइव लॉ के मुताबिक अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमिताभ रावत के समक्ष पेश किए गए सैफी ने दंगों के एक अन्य मामले में शरजील इमाम की जमानत पर बहस करते हुए अभियोजन पक्ष द्वारा किए गए, तर्कों का भी उन्होंने उल्लेख किया, जिसमें यह तर्क दिया गया था कि अस-सलामु अलैकुम शब्द यह दिखाने के लिए पर्याप्त हैं कि उनका भाषण था एक विशेष समुदाय को संबोधित किया। सैफी ने कहा कि मैं हमेशा अपने दोस्तों को सलाम करता हूं। मुझे लगता है कि अगर यह गैरकानूनी है तो मुझे इसे रोकना होगा। मैं एनजीटी में मामला दर्ज करूंगा जब मैं जमानत पर बाहर हो जाऊंगा क्योंकि दिल्ली पुलिस ने इस चार्जशीट पर 20 लाख कीमती कागजात बर्बाद कर दिए हैं। खालिद सैफी और उमर खालिद, नताशा नरवाल, देवांगना कलिता, आसिफ इकबाल तन्हा सहित अन्य आरोपी व्यक्तियों द्वारा मामले में अदालत के समक्ष अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के बाद इससे पहले, मामले में जमानत की अर्जी देने वाले सैफी ने अदालत के समक्ष कहा था कि, नागरिकता संशोधन अधिनियम और एनआरसी के विरोध में उनकी भागीदारी के बारे में उन्हें किसी को भी स्पष्टीकरण देने की ज़रूरत नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति को विरोध करने का संवैधानिक अधिकार है और यह जो अपने आप में किसी भी साजिश का संकेत नहीं है।एफआईआर में यूएपीए की धारा 13/16/17/18, शस्त्र अधिनियम की धारा 25 और 27 और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान की रोकथाम अधिनियम, 1984 की धारा 3 और 4 सहित अन्य गम्भीर आरोप लगाए गए हैं। आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता, 1860 के तहत भी विभिन्न अपराधों के भी आरोप लगाए गए हैं।गौरतलब है कि पिछले साल सितंबर में पिंजारा तोड़ के सदस्यों और जेएनयू के छात्रों देवांगना कलिता और नताशा नरवाल, जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्र आसिफ इकबाल तन्हा और छात्र कार्यकर्ता गुलफिशा फातिमा के खिलाफ मुख्य आरोप पत्र दायर किया गया था। आरोप पत्र में कांग्रेस की पूर्व पार्षद इशरत जहां, जामिया समन्वय समिति के सदस्य सफूरा जरगर, मीरान हैदर और शिफा-उर-रहमान, निलंबित आप पार्षद ताहिर हुसैन, उमर खालिद, शादाब अहमद, तस्लीम अहमद, सलीम मलिक, मोहम्मद सलीम खान और अतहर खान शामिल हैं।गौरतलब है कि इसके बाद, नवंबर में जेएनयू के पूर्व छात्र नेता उमर खालिद और शरजील इमाम के खिलाफ फरवरी में पूर्वोत्तर दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा में कथित बड़ी साजिश से जुड़े एक मामले में एक पूरक आरोप पत्र दायर किया गया था। और अंत मे इतनी गज़ब की कल्पनाशीलता भरी तफ्तीश के लिये दिल्ली पुलिस को सलाम!अब बात करते हैं मुद्दे कि बंटवारे के बाद के सबसे बुरे दंगे की जैसी जांच दिल्ली पुलिस ने की है, यह दुखदाई है। जब इतिहास पलटकर इसे देखेगा तो यह लोकतंत्र के प्रहरियों को दुख पहुंचाएगा। यह आदेश देते हुए दिल्ली की अदालत के एडिशनल सेशन जज विनोद यादव ने शाह आलम (पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन के भाई), राशिद सैफी और शादाब को मामले से बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यह जांच संवेदनहीन और निष्क्रिय साबित हुई है। कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है जैसे कॉन्सटेबल को गवाह के तौर पर प्लांट किया गया था। जज विनोद यादव ने कहा कि यह केस करदाताओं की मेहतन की कमाई की बर्बादी है। कोर्ट ने यह भी कहा कि ये और कुछ नहीं बल्कि, पुलिस ने हमारी आंखों में धूल झोंकने की कोशिश की है।जज ने कहा कि मैं खुद को यह कहने से रोक नहीं पा रहा हूं कि जब लोग बंटवारे के बाद के सबसे बुरे इस दंगे को पलटकर देखेंगे तो, आधुनिक तकनीकों के बाद भी सही जांच करने में पुलिस की नाकामी देखकर लोकतंत्र के प्रहरियों को दुख पहुंचेगा।कोर्ट के आदेश में लिखा है कि ऐसा लगता है जैसे पुलिस ने सिर्फ चार्जशीट दाखिल करके गवाहों को, तकनीकी सुबूत या असली आरोपी को ढूंढने की कोशिश किए बिना केस को हल कर दिया। विदित हो गत वर्ष 24 फरवरी को दंगाइयों ने भजनपुरा गली नंबर-15 में रहने वाले ओम सिंह के खजूरी खास करावल नगर रोड ई-पांच स्थित पान के खोखे को जला दिया था। इस घटना के अगले दिन दंगाइयों ने चांद बाग क्षेत्र में मुख्य वजीराबाद रोड पर हरप्रीत सिंह की दुकान आनंद टिंबर फर्नीचर में लूटपाट के बाद आग लगा दी थी। दयालपुर थाने में दर्ज अलग-अलग मुकदमों में पुलिस ने दिल्ली दंगे के मुख्य आरोपित एवं आप के पार्षद रहे ताहिर हुसैन के भाई शाह आलम , राशिद सैफी और शादाब को आरोपित बनाया था। दोनों ही मामलों में एक-एक कांस्टेबल की गवाही दिलवाई गई। कोर्ट में जब केस चला तो पता चला कि मामले में पुलिसवालों के अलावा कोई गवाह ही नहीं है। आरोपियों से कोई हथियार नहीं मिला है, न ही उनकी उपस्थिति को दर्शाता वीडियो फुटेज अब तक पेश किया गया। कोर्ट में सिद्ध हुआ कि पुलिस कांस्टेबलों ने झूठी गवाही दी है, वह घटनास्थल पर नहीं थे। वह मौके पर होते तो पुलिस कंट्रोल रूम को काल कर सूचना देते, लेकिन इसका कोई रिकार्ड पुलिस के पास नहीं है।

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