दंगों में दिल्ली पुलिस की जांच पर पहली बार सवाल नहीं उठ रहे हैं, 1984 में भी उठे थे

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नई दिल्ली: कार्यकर्ताओं, राजनेताओं, पूर्व आईपीएस अधिकारियों, और दूसरे बहुत से सिविल सर्वेंट्स ने, फरवरी दंगों में दिल्ली पुलिस की जांच को लेकर सवाल उठाए हैं, जिसमें 50 से अधिक लोग मारे गए थे.

नौ पूर्व IPS अधिकारियों ने तो, दिल्ली पुलिस आयुक्त एसएन श्रीवास्तव को पत्र लिखकर मांग भी की, कि वो दंगों की फिर से ‘निष्पक्ष’ तरीक़े से जांच करें. सीनियर एडवोकेट प्रशांत भूषण और कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने भी, इन्हीं भावनाओं का इज़हार करते हुए मांग की कि दिल्ली पुलिस की तहक़ीक़ात की जांच करने के लिए, एक स्वतंत्र आयोग बनाया जाए. भूषण ने तहक़ीक़ात को एक ‘अपराधिक साज़िश’ क़रार दिया.

निष्पक्ष जांच की मांग उस समय और बढ़ गई, जब पुलिस ने 17,000 से अधिक पन्नों की एक चार्जशीट दाख़िल की, जिसमें 15 लोगों को बतौर मुख्य साज़िशकर्ता नामज़द किया गया था. इनमें पिंजरा तोड़ कार्यकर्ता नताशा नरवाल व देवांगना कलिता, और छात्र कार्यकर्ता सफ़ूरा ज़रगर शामिल हैं.

लेकिन, इस सब के बीच पुलिस अपनी बात क़ायम है, कि अपनी तफ़तीश में वो प्रोटोकोल का पालन करती रही है. पहले, जब दिप्रिंट ने दिल्ली पुलिस के अतिरिक्त पीआरओ, अनिल मित्तल से बात की, तो उन्होंने कहा कि पुलिस ने दंगों के सभी मामलों की जांच, पेशेवर तरीक़े से बारीकी के साथ की थी.

लेकिन ये पहली बार नहीं है, कि दंगों में दिल्ली पुलिस की किसी जांच पर सवाल उठाए गए हैं. इसी तरह की चीज़ राष्ट्रीय राजधानी में होने वाले, 1984 के सिक्ख विरोधी दंगों में, पुलिस जांच के दौरान हुई थी.

लेकिन बंटवारे के बाद के सबसे बुरे दंगे की जैसी जांच दिल्ली पुलिस ने की है, यह दुखदाई है। जब इतिहास पलटकर इसे देखेगा तो यह लोकतंत्र के प्रहरियों को दुख पहुंचाएगा। यह आदेश देते हुए दिल्ली की कोर्ट के एडिशनल सेशन जज विनोद यादव ने शाह आलम, राशिद सैफी और शादाब को मामले से बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यह जांच संवेदनहीन और निष्क्रिय साबित हुई है। कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है जैसे कॉन्सटेबल को गवाह के तौर पर प्लांट किया गया था। जज विनोद यादव ने कहा कि यह केस करदाताओं की मेहतन की कमाई की बर्बादी है। कोर्ट ने यह भी कहा कि ये और कुछ नहीं बल्कि, पुलिस ने हमारी आंखों में धूल झोंकने की कोशिश की है।जज ने कहा- मैं खुद को यह कहने से रोक नहीं पा रहा हूं कि जब लोग बंटवारे के बाद के सबसे बुरे इस दंगे को पलटकर देखेंगे तो, आधुनिक तकनीकों के बाद भी सही जांच करने में पुलिस की नाकामी देखकर लोकतंत्र के प्रहरियों को दुख पहुंचेगा।

कोर्ट के आदेश में लिखा है – ऐसा लगता है जैसे पुलिस ने सिर्फ चार्ज शीट दाखिल कर के गवाहों को, तकनीकी सुबूत या असली आरोपी को ढूंढने की कोशिश किए बिना केस को हल कर दिया। विदित हो गत वर्ष 24 फरवरी को दंगाइयों ने भजनपुरा गली नंबर-15 में रहने वाले ओम सिंह के खजूरी खास करावल नगर रोड ई-पांच स्थित पान के खोखे को जला दिया था। इस घटना के अगले दिन दंगाइयों ने चांद बाग क्षेत्र में मुख्य वजीराबाद रोड पर हरप्रीत सिंह की दुकान आनंद टिंबर फर्नीचर में लूटपाट के बाद आग लगा दी थी। दयालपुर थाने में दर्ज अलग-अलग मुकदमों में पुलिस ने दिल्ली दंगे के मुख्य आरोपित एवं आप के पार्षद रहे ताहिर हुसैन के भाई शाह आलम , राशिद सैफी और शादाब को आरोपित बनाया था। दोनों ही मामलों में एक-एक कांस्टेबल की गवाही दिलवाई गई। कोर्ट में जब केस चला तो पता चला कि मामले में पुलिसवालों के अलावा कोई गवाह ही नहीं है। आरोपियों से कोई हथियार नहीं मिला है, न ही उनकी उपस्थिति को दर्शाता वीडियो फुटेज अब तक पेश नहीं किया गया। कोर्ट में सिद्ध हुआ कि पुलिस कांस्टेबलों ने झूठी गवाही दी है, वह घटनास्थल पर नहीं थे। वह मौके पर होते तो पुलिस कंट्रोल रूम को काल कर सूचना देते, लेकिन इसका कोई रिकार्ड पुलिस के पास नहीं है।

दिल्ली हाई कोर्ट : एक ही मामले में पांच एफआईआर। घटना एक रिपोर्टकर्ता पांच। गवाह भी समान और मुजरिम भी समान। कोर्ट ने पुलिस को खरी-खरी सुनाई व चार एफआईआर रद्द कर दीं।

दिल्ली हाईकोर्ट ने फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली हिंसा के दौरान हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल की हत्या के मामले के साथ-साथ एक डीसीपी को घायल करने के मामले में 5 आरोपियों को शुक्रवार को जमानत दे दी। जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने आदेश पारित करते हुए कहा कि अदालत की राय है कि याचिकाकर्ताओं को लंबे समय तक सलाखों के पीछे नहीं रखा जा सकता है और उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों की सत्यता का परीक्षण ट्रायल के दौरान भी किया जा सकता है। पुलिस ने फुरकान, आरिफ, अहमद, सुवलीन और तबस्सुम को पिछले साल गिरफ्तार किया था। हाईकोर्ट ने महिला सहित पांच आरोपियों को जमानत देते हुए शुक्रवार को कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध और असहमति जताने का अधिकार मौलिक है। कोर्ट ने कहा कि इस विरोध करने अधिकार का इस्तेमाल करने वालों को कैद करने के लिए इस कृत्य का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि यह सुनिश्चित करना अदालत का संवैधानिक कर्तव्य है कि राज्य की अतिरिक्त शक्ति की स्थिति में लोगों को व्यक्तिगत स्वतंत्रता से मनमाने ढंग से वंचित नहीं किया जाए।

दिल्ली के उत्तर-पूर्वी इलाके में सीएए के खिलाफ़ शुरू हुए प्रदर्शनों का अंत षर्मनाक दंगों के रूप में हुआ. 23 फ़रवरी से 26 फ़रवरी 2020 के बीच हुए दंगों में 53 लोगों की मौत हो गई। इस दंगे में 40 मुसलमान और 13 हिंदू मारे गए थे। दिल्ली पुलिस ने दंगों से जुड़ी कुल 751 एफ़आईआर दर्ज की,जिनमें से 400 मामलों को सुलझाने का दावा पुलिस का है।.पुलिस कहती है कि 349 मामलों में चार्जशीट दाखिल की गई है. 102 सप्लीमेंट्री चार्जशीट भी दाखिल की गई हैं. 303 मामलों की चार्जशीट पर अदालत ने संज्ञान लिया है। दिल्ली दंगों में शामिल कुल 1825 लोग गिरफ्तार किए गए. जिनमें 869 हिन्दू समुदाय और 956 मुस्लिम थे। इस दंगे से जुड़े 18 लोगों पर यूएपीए लगाया गया और इनमें से 16 मुस्लिम हैं, । दे हिंदू – नताषा और देवांगना को भी मुस्लिम पक्ष की तरफ से ही फंसाया गया।

सबसे भयानक तो वे दस से अधिक एफआईआर हैं जिनमें लोनी के विधायक नंदकिषोर गूजर, पूर्व विधायक जगदीष प्रधान, मोहन नर्सिंग होम के सुनील, कपिल मिश्रा आदि को सरे आम दंगा करते, लोगों की हत्या करते, माल-असबाब जलाने के आरोप हैं। यमुना विहार के मोहम्मद इलीयास और मोहम्मद जामी रिजवी ,चांदबाग की रुबीना बानो बानो, प्रेम विहार निवासी सलीम सहित कई लोगों की रिपोर्ट पर पुलिस थाने की पावती के ठप्पे तो लगे हैं लेकिन उनकी जांच का कोई कदम उठाया नहीं गया। इसी तारतम्य में हाई कोर्ट के जज श्री मुरलीधरन द्वारा कुछ वीडियो देख कर दिए गए जांच के आदेष और फिर जज साहब का तबादला हो जाना और उसके बाद उनके द्वारा दिए गए जांच के आदेष पर कार्यवाही ना होना वास्तव में न्याय होने पर षक खड़ा करता है।

दंगे मानवता के नाम पर कलंक हैं। धर्म, भाषा, मान्यताओं, रंग जैसी विषमताओं के साथ मत-विभाजन होना स्वाभाविक है। एकबारगी लगता हो कि दंगे महज किसी कौम या फिरके को नुकसान पहुंचाते हैं, असल में इससे नुकसान पूरे देष के विकास, विष्वास और व्यवसाय को होता है। जरूरत इस बात की है कि दंगों के असली कारण, साजिष को सामने लाया जाए तथा मैदान में लड़ने वालों की जगह उन लोगों को कानून का कड़ा पाठ पढ़ाया जाए जो घर में बैठ कर अपने निजी स्वार्थ के चलते लोगों को भड़काते हैं व देष के विकास को पटरी से नीचे लुढकाते हैं। इसी लिए आज जरूरी हो गया है कि दिल्ली दंगों की जांच की जांच किसी निश्पक्ष एजेंसी से करवाई जाए, यदि हाई कोर्ट के किसी वर्तमान जज इसकी अगुआई करें तो बहुत उम्मीदें बंधती हैं।

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