क्या वहशी दरिंदों को चीखती चिल्लाती मासूम लड़कियों पर ज़रा भी तरस नहीं आता होगा

लेखिका :सुमरा परवेज़

सिहर जाती हूं सोच कर भी कि क्या होता अगर निर्भया या मनीषा की जगह “आप” या “मैं” होती?
जो बात सोच कर भी हम कांप जाते हैं वो लम्हा मासूम लड़कियां बर्दाश्त करती हैं। कितना डरावना होता होगा वो पल जब लड़की गिड़गिड़ाती होगी, अपने बचाव के लिए इधर उधर भागती होगी, चीखती होगी, चिल्लाती होगी, रोती होगी, अपनी इज़्ज़त और अपनी ज़िंदगी की भीख मांगती होगी लेकिन वहां कोई उनकी सुनने वाला नहीं होता। दरिंदे बस अपनी दरिंदगी दिखाते हुए हंसते होंगे, मज़े लेते होंगे।
कभी-कभी सोचती हूं कि क्या मिलता होगा लोगों को एक पल में एक हस्ती खेलती लड़की की ज़िंदगी बर्बाद करके।
क्या उनकी आत्मा उनको कचोटती नहीं होगी? क्या उन्हें लड़की पर तरस नहीं आता होगा? क्या सच में उस वक्त उनके अंदर का इंसान मर जाता होगा?
24 साल की निर्भया हो या 19 साल की मनीषा, 8 साल की आसिफा हो या 90 साल की बूढ़ी दादी। हैवानियत ना उम्र देखती है और ना ही मज़हब।
घटना के बाद लोग मोमबत्तियां लेकर सड़क पर आ जाते हैं । सोशल मीडिया पर अपना आक्रोश जताते हैं। सत्ताधारी अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने में लग जाते हैं। मसला अगर हिंदू-मुस्लिम वाला हो तो न्यूज़ चैनल्स पर नफरतें बांटी जाती हैं, डिबेट्स होती है और अगर हिंदू मुस्लिम वाला एंगल नहीं दिखता तो बस 1 दिन की खबर बनकर मसला खत्म हो जाता है। मज़े की बात ये है कि देश के प्रथम पुरुष द्वारा ऐसी घटनाओं पर एक संवेदना तक नहीं आती।
दो-चार दिन में लोग सब कुछ भूल जाते हैं। और फिर कुछ ही घंटों में एक नई घटना की खबर आती है।
क्योंकि ये नई वाली घटना बस “बलात्कार” की होती है, उसमें मनीषा की तरह ना ज़ुबान काटी जाती ना गर्दन और रीढ़ की हड्डीयां तोड़ी जाती ना निर्भया की तरह चलती बस में बर्बरता के बाद फेंका जाता है, तो लोगों का ध्यान उस पर ज़्यादा नहीं जाता।
पर किसी गली मोहल्ले में एक लड़की की ज़िंदगी फिर बर्बाद हो चुकी होती है। एक पिता का अभिमान और एक मां की दुलारी फिर चीखों में सिमट कर रह जाती है।
ये किस तरह के समाज में जी रहे हैं हम? जहां मर्दों को दुनिया में लाने वाली महिलाएं ही सुरक्षित नहीं है। वो महिलाएं जिन्हें हर धर्म में बहुत ऊंचा स्थान दिया गया है। फिर क्यों महिलाओं के साथ इस तरह की बर्बरता की जाती है और कब तक की जाती रहेगी?
क्यों इसके खिलाफ सख्त कानून नहीं बनता? क्यों बलात्कारियों को फांसी पर नहीं लटकाया जाता? क्यों बलात्कारियों के सपोर्ट में लोग आकर खड़े हो जाते हैं?
और सबसे अहम बात ये है कि सोशल मीडिया पर जिस तरह लोग बलात्कारियों को सज़ा दिलवाने, गोली मारने, लटका देने की बात करते हैं उस तरह पुलिस से सवाल क्यों नहीं करते ? कानून को कटघरे में खड़ा क्यों नहीं करते? सरकार से सवाल क्यों नहीं पूछते कि देश की कानून व्यवस्था इतनी जर्जर क्यों है, सत्ता में बैठी सरकार अगर देश की बेटियों को ही नहीं बचा पा रही तो ऐसी सरकार से और क्या उम्मीद की जा सकती है।
दूसरी तरफ हमें खुद को भी देखने की ज़रूरत है, कमियां कहां हो रही है ऐसे घिनौने अपराध को अंजाम देने वाले व्यक्ति किसी और ग्रह से नहीं आते वो हमारे और आपके बीच ही मौजूद हैं। ऐसे दरिंदों की पहचान करना बहुत ज़रूरी है ताकि देश की बेटियों को बचाया जा सके।
हमें देश में अब कोई निर्भया, आसिफा या मनीषा नहीं चाहिए।

(ये उनके अपने विचार हैं )

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