जंतर मंतर पर हिंदुत्व हिंसक भीड़ का जमावड़ा,पत्रकार पर भी हमला

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नई दिल्ली: सांप्रदायिकता इंसान को मानव बम में बदल देती है। दिल्ली के जंतर मंतर पर जो हुआ वही हरियाणा के पटौदी में हुआ। ये लोग बिना दूसरे मज़हब के ख़िलाफ नफरती बात के अपने धर्म की बात नहीं कर सकते। नफ़रत के बिना जी ही नहीं सकते। जय श्री राम बुलवाने के लिए किसी को जान से मार देना या किसी को जान से मारने की धमकी देना हर दिन की कहानी बनती जा रही है। जंतर मंतर पर नेशनल दस्तक के पत्रकार अनमोल प्रीतम को भी घेर लिया गया। वे अपना काम करने गए थे। जब एक धर्म के ख़िलाफ़ नारे लग रहे थे तब रिकार्ड कर रहे थे। अनमोल को घेर लिया गया। अनमोल ने नारे लगाने से मना कर दिया। क्यों किया उसके लिए आपको यह इंटरव्यू देखना होगा। समझना होगा कि उसके इंकार की प्रक्रिया क्या थी? सोच क्या थी?

जय श्री राम का नारा अधूरा नारा है। सीता का नाम ग़ायब है। अब यह श्रद्धा से ज़्यादा नारा ही है। राजनीति का नारा है। कहीं चुनाव होने वाले हों तो नफरती सोच को ऊपर लाने का नारा हो गया है। जब सरकार नौकरी महंगाई पर फेल हो जाती है तब लगने लगता है। इस नारे का इस्तमाल केवल दूसरे मज़हब के प्रति नफ़रत फैलाने या बेवजह ललकारने के लिए तो होता ही है अपने मज़हब के भीतर इसी काम के लिए होता है। बंगाल के लोग माँ दुर्गा की पूजा करते हैं। क्या दुर्गा किसी अन्य धर्म से जुड़ी हैं लेकिन वहाँ जाकर ललकारने लगे कि जय श्री राम बोलना होगा। अपने ही धर्म के भीतर नफ़रत फैला रहे थे। इसके सहारे दो धर्मों के बीच और अपने धर्म के भीतर विभाजन की रेखा खींची जा रही है।

यह जो हो रहा है उसे थोड़ा ठहर कर देखिए। क्या आप इन बातों के बिना बीजेपी को पसंद नहीं कर सकते है ।उसे पसंद करने की यही सीमा और शर्त क्यों होती है! क्यों चुनाव आते ही इसे उछाला जाने लगता है!

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