इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में एक घंटा, मन हो गया चंगा

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में एक घंटा, मन हो गया चंगा

2014 में बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के हिन्दी विभाग गया था। 2019 मे इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के हिन्दी विभाग जाने का मौका मिल गया। हिन्दी विभाग की लाइब्रेरी में निराला का पोट्रेट देखकर कुछ हो गया। लाइब्रेरी में छात्राओं को बैठा देखा। विभाग भीतर से नया किया गया है। फ़र्श की चमक नई लग रही थी। स्टाफ़ रूम की कुर्सियाँ और गोलमेज़ से लगा कि हिन्दी विभाग में भी फ़ंड आया है। आम तौर पर हिन्दी विभाग उपेक्षित रह जाता है।

विभागाध्यक्ष के कमरे में शिक्षकों का जमावड़ा अच्छा लगा। उनके काम के बीच टपक गया। बग़ैर पूर्व अनुमति के। इसके लिए क्षमा चाहता हूँ। काम के माहौल में हजहज आश्वस्त करता है। जीवंतता नज़र आई। भरा-पूरा विभाग अच्छा लगता है। शिक्षकों का शुक्रिया। अपने काम के बीच बैठने की जगह देने के लिए। ज़माने बाद प्रणय कृष्ण को देखा। मश्ताक़ अली से मिला। बाकी गुरुजन माफ़ करें। नाम भूल गया।

शिक्षकों की सक्रियता का असर क्लास रूम में दिखा। हिन्दी विभाग ने छात्रों को मुफ़्त में यूजीसी नेट की कोचिंग देने का फ़ैसला किया है। इससे लगा कि शिक्षकों के लिए उनके छात्र महत्वपूर्ण है। विचार यही है कि सब कोचिंग का ख़र्च नहीं उठा पाते तो शिक्षक ही उनकी मदद करें । यह शिक्षकों की प्रतिबद्धता की चुनौती भी है कि वे छुट्टी के दिनों में छात्रों को तैयार कर रहे हैं। इससे छात्र शिक्षक संबंध बेहतर ही होता है।

क्लास में गया तो हर सीट भरी मिली। पीछे की बेंच पर लड़कों के साथ लड़कियों को बैठा देख अच्छा लगा। दूर बायीं तरफ यानी सबसे पीछे तीन लड़कियाँ बैठी हुई थीं। पहली बेंच से लेकर आख़िरी बेंच तक लड़के लड़कियों के बैठने में मिश्रण दिखा। यह दृश्य बनते रहना चाहिए। इससे दोनों बेहतर होते हैं। थोड़ी देर में सहजता बन गई। मीडिया को लेकर सवाल जवाब हुए। सवालों की उत्सुकता से मन गदगद हो गया। हर तरफ से सवाल आए। लड़कियों ने ख़ूब पूछा। संकोच रहित क्लास रूम अच्छा लगता है। हिन्दी के छात्रों से एक लगाव तो होता ही है। उन्हें कितना कम मिलता है। हर चीज़ देर से मिलती है। दशकों बाद मिलती है। मेरे मन में चाहत तो रहती है कि वे सबसे अच्छा करें। छात्रों के बीच इस तरह की सक्रियता शिक्षकों के बग़ैर तो आ नहीं सकती। यह रिश्ता बना रहे।

हमने तो ऊपर ऊपर से देखा। ज़रूर वास्तविकताएँ और होती हैं। मगर ऊपर ऊपर से देख कर ही अच्छा लगा। दिल्ली के बाहर विभाग का निर्माण करना और उसमें जान भरना आसान काम नहीं है। लेकिन लोगों को दिल्ली और मीडिया के बग़ैर जीने की आदत डालनी पड़ेगी। वर्ना वे हर समय अप्रासंगिक होने के मनोरोग से जूझते रहेंगे। अब तो कुंभ के कारण इलाहाबाद की सड़के भी अच्छी हो गई है। शहर का बड़ा हिस्सा महानगर जैसा हो गया है। चमकदार भी। अगर यूनिवर्सिटी अपना खोया गौरव हासिल कर ले तो शहर में जो व्यापक निवेश हुआ है, वह और सार्थक हो जाएगा। कैंपस तो अच्छा है ही।

अमितेश Amitesh Kumar से भी मुलाक़ात हुई। वहाँ उसने थियेटर की टीम बना ली है। क्या यह शानदार बात नहीं है कि बी ए प्रथम वर्ष की दिव्या ने नाटक की रचना की और उसका मंचन किया गया। यूनिवर्सिटी ऐसे ही बनती है। छात्र छात्राओं के आत्मविश्वास और आउटलुक को बदल कर। कुलमिलाकर छात्रों के अच्छे समूह से मिलकर आया हूँ। उम्मीद है वे कभी गुणवत्ता और पेशेवर मूल्यों से समझौता नहीं करेंगे। कुछ न कुछ अच्छा होगा। हमारी हिन्दी चमकती रहे।

मैं दिल्ली के लिए निकल चुका हूँ ! इलाहाबादी नाराज़ न हों। हमें काम भी करना होता है। मुलाक़ात में ही वक्त जाएगा तो फिर काम कहाँ से हो पाएगा। सबसे माफ़ी।

loading...
आप की बात हम लिखेंगे jjpnewsdesk@gmail.com भेजें

जे जे पी न्यूज़ एक स्वतंत्र, गैर लाभकारी संगठन है हमारी पत्रकारिता को जारी और आज़ाद रखने के लिए आर्थिक मदद करें.