महाराष्ट्र की राजनीति पेचीदा खेल है,मुख्यमंत्री ठाकरे ने अब तक जमीन पर अपनी पकड़ बनाए रखे हैं।

किसी भी वीडियो को डाउनलोड करें बस एक क्लिक में 👇
http://solyptube.com/download

मुंबई : जुनैद मलिक अत्तारी, महात्मागांधी ने महाराष्ट्र के वर्धा जिले के सेवाग्राम में अपने जीवन के कई साल गुजारे है। मैं फिलहाल काफ़ी समय से महाराष्ट्र में प्रवास पर हूँ। यहां रहते हुए राज्य के लोगों को करीब से जानने का मौका मिला। आज भी महाराष्ट्र के ग्रामीण क्षेत्रों में हिंदू मुस्लिम एकता बहुत मजबूत है। यहां सभी समुदायों के लोग एक दूसरे की भावनाओं की कद्र करते हैं और एक-दूसरे के धर्मों का सम्मान करते हैं। यहां के गांवों में मुस्लिम समुदाय के लोगों की संख्या कम है फिर भी उन्हें अपने धार्मिक विश्वास अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता है। यहां सभी धर्मों के लोग एक दूसरे के सभी सुख दुख के कार्यों में शामिल होते हैं। देश के विभिन्न राज्यों में जैसा एक दूसरे के प्रति नफ़रत का ज़हर फैल चुका है लेकिन यहां ऐसा बिल्कुल नहीं है। यहां राजनीति एक दल को छोड़कर इतनी बुरी भी नहीं है।

अब बात करते हैं राजनीति की तो पाते हैं कि महाराष्ट्र राज्य की राजनीति पेचीदा खेल है और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने अब तक जमीन पर अपनी पकड़ बनाए रखी है।महाराष्ट्र में महा विकास आघाड़ी सरकार अविश्वास के माहौल में उभरी।

भारतीय जनता पार्टी का शिव सेना के साथ तीन दशकों के साथ साथ काम करने वाला संबंध था। यह हिन्दुत्व के विचार के आधार पर सतही तौर पर था। उस हिन्दुत्व की परिभाषा मुख्यतः मुस्लिम-विरोधी होना था। शिव सेना का 1966 में गठन हिन्दुत्व की पहचान के सवाल पर नहीं हुआ था। लेकिन शिव सेना-जनसंघ-बीजेपी गठबंधन इसलिए बना क्योंकि दोनों पार्टियां अपने दम पर कांग्रेस से जूझने में कमजोर थीं।

लेकिन दोनों पार्टियों का सामाजिक गठन बहुत ही भिन्न था। भाजपा मुख्यतः शहरी, बड़े लोगों, उच्च जाति और मध्य तथा उच्च वर्गों की पार्टी थी। शिव सेना कामकाजी वर्ग के बीच बेरोजगार लोगों, निम्न मध्यवर्ग के युवा जिनकी न तो अच्छी शिक्षा थी और न जिनमें पेशेवर कुशलता थी, का गुस्सैल विस्फोट थी। युवाओं का यह वर्ग न तो कोई उम्मीद रख रहा था और न उसके पास भविष्य की कोई अपेक्षा थी। मराठी समुदाय, प्राथमिक तौर पर मुंबई में, के बीच चिंता यह थी कि वे महाराष्ट्र में पहचान और सम्मान के हकदार हैं। इसने अधिकतर मराठी भाषी लोगों, यहां तक कि मध्यवर्ग को लुभाया। ऐसा इसलिए कि सिर्फ छह साल पहले महाराष्ट्र राज्य का गठन हुआ था।राजनीतिक तौर पर, पार्टियों के पास बढ़ने की कोई गुंजाइश नहीं थी।

भाजपा अपने को सम्माननीय मध्य वर्ग की पार्टी के तौर पर समझती थी और शिव सेना के बारे में उसका विचार था कि यह निम्न वर्ग की पार्टी है। फिर भी, सत्ता पर कब्जे के लिए ये दोनों साथ आए। भाजपा ने प्रतिभा उपलब्ध कराई और शिव सेना ने सड़कों पर संघर्ष करने वाले लोग दिए। भाजपा में सब दिन एक किस्म की श्रेष्ठता मनोग्रंथि वाला खास वर्ग का तौर- तरीका था। औसत शिव सैनिक उनके प्रति भाजपा नेतृत्व के तिरस्कारपूर्ण लहजे से बराबर अपमानित महसूस करते थे।

लेकिन दोनों को एक-दूसरे की जरूरत थी। शिव सेना ने हिन्दुत्व के लिए आक्रामक अभियान चलाना चुना और भाजपा ने उन्हें प्रोत्साहित करना आरंभ किया। 1995 में बहुसंख्यक सीटें जीतकर नहीं बल्कि अंकगणितीय अनिवार्यता की वजह से तथाकथित भगवा गठबंधन सत्ता में आया। लेकिन तब शिव सेना बड़ा भाई थी क्योंकि इसके पास भाजपा से अधिक सीटें थीं। खास उच्चता रखने का भ्रम पालने वाली भाजपा के लिए यह अस्वीकार्य था कि राष्ट्रीय और सांस्कृतिक तौर पर श्रेष्ठ होने के बावजूद उसे निम्न वर्ग के संगठन के नेतृत्व के अधीन काम करना पड़ेगा। लेकिन 2014 में स्थिति पूरी तरह बदल गई। भाजपा अपने दम पर केन्द्र में बहुमत में आई और वह महाराष्ट्र में महत्वपूर्ण शक्ति बन गई। अब वह यहां भी दबंगई दिखाने लगी। उन लोगों ने शिव सेना नेतृत्व का अनादर, उनकी अनदेखी और उनके साथ दुर्व्यवहार आरंभ कर दिया। बालासाहब ठाकरे का 2012 में निधन हो गया। गुजराती मुख्यमंत्री के पास जूनियर ठाकरे के लिए उपहास के अतिरिक्त कुछ नहीं था। राज ठाकरे से भिन्न उद्धव ठाकरे का व्यक्तित्व नरम है।

प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा ने सोचा कि वे उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिव सेना पर सवारी कर सकते हैं। दिल्ली के साथ-साथ महाराष्ट्र में भी भाजपा ने सेना को कोई महत्व नहीं दिया। सेना, खास तौर से उद्धव ठाकरे ने इस अपमान को दिल पर ले लिया। तब भाजपा ने कुछ सीटों का प्रस्ताव देकर यह कहते हुए उन्हें पुचकारने का प्रयास किया कि अब भाजपा बड़ा भाई है। शिव सेना अपने कम संख्या बल की वजह से प्रतिकार नहीं कर सकी। लेकिन यह असहनीय हो गया जब तब के भाजपा अध्यक्ष और अब केन्द्रीय गृह मंत्री ने पहले मुख्यमंत्री-पद का वायदा कर और बाद में इससे पीछे हटकर धोखा दे दिया।

भाजपा और शिव सेना- दोनों को मिलाकर विधानसभा में संख्या बल 161 है। इसमें भाजपा की सीटें 105 हैं। उद्धव समझ गए कि भाजपा का खेल तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक, पंजाब में अकालियों, आंध्र प्रदेश में वाई एस आर कांग्रेस, तेलंगाना में टीआरएस आदि-जैसे क्षेत्रीय दलों को निगल लेना है। शिव सेना, शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी और कांग्रेस में विचाराधारात्मक, संगठनात्मक या सामाजिक तौर पर कुछ भी आम नहीं है। उनके वोट बैंक अलग हैं, उनके कार्यक्रम भिन्न हैं, उनके नेतृत्व की शैली अलग हैं और फिर भी, तीनों पार्टियों को भय है कि मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा उन पर ग्रहण लगा देगी।

लेकिन एक बात तीनों में समान थीः मोदी-शाह को रोकने की मजबूरी। महा विकास आघाड़ी इसलिए राजनीतिक आवश्यकता की उपज है। जहां तक यहां के लोगों से मुलाकात के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूं कि मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे शांत चित्त हैं, वह आडंबरपूर्ण राजनीतिक इच्छाएं नहीं दिखाते, उन्होंने कभी दावा नहीं किया कि वह सभी समाधान जानते हैं, दूसरे दलों के नेताओं, वरिष्ठ नौकरशाहों तथा स्वतंत्र विशेषज्ञों एवं यहां तक कि मीडिया से भी सीखने को वह तैयार रहते हैं। साम-दाम-दंड-भेद- किसी भी तरह सत्ताच्युत कर देने की जुगत में लगे राजनीतिक विरोध, बहुत संशयात्मक और अविश्वसनीय मीडिया तथा सीबीआई, एनआईए, ईडी, एनसीबी या आयकर-जैसी केन्द्रीय एजेंसियों के जरिये प्रतिशोध की राजनीति को उन्होंने झेला है।

इन सबसे ऊपर, केन्द्रीय गृह मंत्री और प्रधानमंत्री कार्यालय सरकार गिराने में सक्रिय रुचि ले रहे हैं। यहां तक कि महामारी के समय का भी सरकार को बदनाम करने और मुट्ठी में करने में उपयोग किया गया। लेकिन उद्धव ठाकरे ने अपना आपा नहीं खोया। शरद पवार और उद्धव ठाकरे सटीक क्रिकेट खिलाड़ी हैं जिन्हें सोनिया गांधी और राहुल गांधी का पूरा समर्थन है।

शिव सेना के मुखपत्र सामना के कार्यकारी संपादक संजय राउत उनके और सेना के बीच महत्वपूर्ण लिंक बन गए हैं। संदेह करने वाली और संशयी नौकरशाही और मीडिया तथा चिंतित लोग सत्तारूढ़ गठबंधन के मुख्यमंत्री के तौर पर उद्धव ठाकरे को स्वीकार करने लगे हैं। यह अब साफ है कि भाजपा ने महाराष्ट्र में अपनी जमीन खो दी है। बिजनेसमैन -जैसी उद्धव ठाकरे की शैली, शरद पवार की राजनीतिक कुशाग्रता और राहुल गांधी की नम्रता ने उन लोगों को एक साथ बांधे रखा है।आखिर में अपनी बात खत्म करते हुए कहना चाहता हूं कि मौजूदा समय में पूरी मोदी सरकार जिस तरह से महाराष्ट्र सरकार की सरकार के पीछे पड़ी है।

इन सभी मुद्दों से निपटना किसी भी व्यक्ति के लिए आसान नहीं होता।महाराष्ट्र सीएम उद्धव ठाकरे ने जितने झंझावात झेले हैं, उतने का महाराष्ट्र के किसी अन्य मुख्यमंत्री ने सामना नहीं किया होगा । उनके समय में राज्य में सूखा, तूफान, प्रचंड बारिश और कोरोना महामारी-जैसी कई प्रमुख प्राकृतिक आपदाएं आईं लेकिन उन्होंने हर स्थिति का कुशलतापूर्वक सामना किया और कुशल राजनीतिज्ञ के तौर पर उभरे। यहां यह कहना दुरुस्त होगा यह सब उद्धव ठाकरे के व्यक्तित्व का ही कमाल है कि उन्होंने आपसी विश्वास और सहयोग के साथ महाराष्ट्र को विकास के पथ पर अग्रसर कर दिया है।

Donate to JJP News
जेजेपी न्यूज़ को आपकी ज़रूरत है ,हम एक गैर-लाभकारी संगठन हैं,इसे जारी रखने के लिए जितना हो सके सहयोग करें.

Donate Now

अब हमारी ख़बरें पढ़ें यहाँ भी
loading...