मलाला युसुफ़ज़ई का बयान हिंदू-मुस्लिम समाज के बहन बेटियों के लिए खतरा,क्या है ये एक सोची समझी साज़िश?

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(लेखिका–रूहिना परवेज़)
पिछले दिनों मलाला यूसुफज़ई सोशल मीडिया पर अपने एक स्टेटमेंट की वजह से चर्चा का विषय बनी हुई थी।
अपने एक इंटरव्यू में मलाला ने शादी को गैरज़रूरी बताते हुए कहा कि “मैं यह बात नहीं समझ पा रही हूं कि लोग शादी क्यों करते हैं।अगर आपको जीवनसाथी चाहिए तो आप शादी के कागज़ों पर साइन क्यों करते हैं,यह केवल एक पार्टनरशिप क्यों नहीं हो सकती है?जिसके बाद सोशल मीडिया पर मलाला को काफी‌ ट्रोल भी किया गया।
एक सभ्य समाज के लिए बिना शादी के एक लड़का और लड़की के साथ रहने को मान्यता प्राप्त नहीं है। कोई भी धर्म इसकी इजाज़त नहीं देता। क्योंकि मलाला मुस्लिम समाज की ताल्लुक रखती हैं तो इसलिए उनका ये बयान और भी चर्चा का विषय बना। मुस्लिम समाज में तो ऐसे रिश्ते को हराम बताया गया है।
अब सवाल ये उठता है कि मलाला ने एक मुस्लिम लड़की होने के बावजूद ऐसा बयान क्यों दिया।जब आप समाज में एक ऐसे मुक़ाम पर पहुंच जाते हो जब आपको लोग एक रोल मॉडल की तरह देखने लगते हैं और खासतौर पर जब आप विश्व के करोड़ों लोगों को प्रेरित करती हो तो आपकी ज़िम्मेदारी बन जाती है की आप जो भी बोलें बहुत सोच समझकर बोले,क्योंकि उसका लोगों के दिमाग़ पर गहरा असर पड़ता है।
पिछले कुछ सालों से मलाला युसुफ़ज़ई दुनिया भर की लड़कियों का रोल मॉडल बनी हुई है।स्कूल, कॉलेज में उनकी कहानियां सुना कर बच्चों को प्रेरित किया जाता है।ऐसे में इस तरह का बयान मासूम ज़ेहनों पर ग़लत असर डालता है।अपने रोल मॉडल का किसी भी समाज के बच्चों पर बहुत गहरा असर पड़ता है और मलाला के इस बयान पर सवाल यह भी उठता है कि क्या यह विचारधारा वाक़ई मलाला की अपनी है या उनसे बुलवाई गई है।पिछले कुछ समय से देखा जा रहा लोगो के रोल मॉडल बने नौजवान अचानक से अजीबोगरीब हरकतें करते या स्टेटमेंट देते हुए नज़र आते हैं। क्या ये एक सोची समझी साज़िश का हिस्सा है। जिसमें पहले एक रोल मॉडल आपके सामने तैयार कर दिया जाता है,जब आप उसकी सीखों पर चलना शुरू कर देते हैं तो उससे फिर ऐसे स्टेटमेंट्स या ऐसी हरकतें कराई जाती है जो समाज के लिए अच्छी नहीं होती और बच्चों के दिमाग पर गलत प्रभाव डालती हैं।
ज़रुरत है लोगों को समझने की और देखने की कि आपका बच्चा किससे प्रेरित हो रहा है। किसे अपनी ज़िंदगी में अपना आदर्श मानकर चल रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि उसका आदर्श ही उसे गुमनामियों में धकेल दे।
कौन हैं वो लोग जो एक सभ्य समाज को असभ्यता की तरफ ले जाने की कोशिशों में लगे रहते हैं? या ये liberalism और वेस्टर्न कल्चर के नाम पर बच्चों की ज़िंदगियों से खेल रहें हैं?
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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