मोदी सरकार नमक रोटी पर गुजर कर रहे लोगों को पूरी तरह भुखमरी की ओर धकेल चुकी है

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क्या कभी ऐसा हुआ है कि आपके घर में कई रोज तक सब्जी या दाल न बनी हो? क्या ऐसा हुआ है कि आपके घर में सब्जी या दाल खरीदने का पैसा न हो? ऐसी हालत में हमारी माताएं चटनी, अचार, खटाई, नमक मिर्च या भर्ता जैसा कोई सालन तैयार करती हैं और उसी से परिवार पेट भर लेता है. जो लोग यहां गांव से होंगे, या जिनकी आर्थिक स्थिति कम अच्छी होगी, उन्हें ऐसे अनुभव जरूर होंगे.

महंगाई ऐसे परिवारों की मुसीबत और बढ़ा रही है. पिछले दो दशकों में करोड़ों लोग मेहनत मजदूरी करके, नौकरी करके अपने को गरीबी रेखा से बाहर लाए थे लेकिन उन्हें फिर से उसी हालत में धकेल दिया गया है.

महंगाई कुछ लोगों का सिर्फ बजट बिगाड़ती है, लेकिन कुछ लोगों के मुंह से निवाला छीन लेती है. हमारे गांवों से ऐसी खबरें आ रही हैं कि लोग सब्जियां और दालें नहीं खरीद पा रहे हैं. महंगाई बढ़ी और गांव के लोगों ने सब्जी, दाल, चीनी, तेल, प्याज जैसी चीजों की खपत कम कर दी है. महंगाई में वे अपनी जरूरतें कम कर रहे हैं. महंगाई और आर्थिक तंगी उन्हें नमक रोटी खाने पर मजबूर कर रही है.

एक तरफ देश में करोड़ों लोगों का रोजगार छीन लिया गया है. पिछले एक साल में 23 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे चले गए हैं. 2020 तक भारत में करीब 38 करोड़ लोग गरीब थे और इनमें से 80 प्रतिशत लोग गांवों में रहते थे. अब यह संख्या 70 से 80 करोड़ पहुंच रही है. जिन 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन देने का दावा किया जा रहा है, मानना चाहिए कि वे गरीब ही हैं.

पिछले 15 साल में जितने लोग गरीबी रेखा से बाहर आए थे, मोदी सरकार ने उतने ही लोगों को फिर से गरीबी रेखा से नीचे धकेल दिया है.

आर्थिक तबाही की हर बात यहां से शुरू की जानी चाहिए कि इसके लिए कोरोना नहीं, सिर्फ सरकार जिम्मेदार है. कोरोना पूरी दुनिया में है और ज्यादातर बड़े देशों की अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट रही है. भारत ने कोरोना से पहले ही बेरोजगारी का 45 सालों का रिकॉर्ड कायम कर लिया था और जीडीपी ढहने लगी थी. भारत लगातार दूसरे वित्त वर्ष में नगेटिव ग्रोथ का सामना कर रहा है और यह सरकार की नोटबंदी जैसी विध्वंसक नीतियों का नतीजा है.

आर्थिक मोर्चे पर आई तबाही देश को बर्बादी की ओर ले जाएगी. आपकी जेब में दमड़ी नहीं होगी तो सारी लंतरानी बेकार है. ये सरकार पहले से नमक रोटी पर गुजर कर रहे लोगों को भुखमरी की ओर धकेल चुकी है.

सड़क किनारे रोटी पका रहे मजदूरों की फोटो 2016 में लखनऊ में खींची थी. ऐसे लोगों को और बेहतर जिंदगी दी जानी थी, लेकिन उन्हें और मुसीबत में डाल दिया गया है.

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