90 साल के दर्शक मोहम्मद समीउल्लाह साहब को मेरा प्रणाम : रवीश कुमार

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व्हाट्स ऐप में अचानक अंधेरे में डूबी एक तस्वीर आ गई। इस कमरे की रौशनी मद्धिम है। पुराना टीवी सेट रखा है। कोई शख़्स जिनकी पीठ सीधी है, टीवी के क़रीब बैठकर प्राइम टाइम देख रहे हैं। मैसेज में लिखा है कि ये मेरे बड़े पापा हैं। हर रात नौ बजे टीवी के सामने होते हैं। जब हम दिन भर तैयारी में लगे होते हैं तो पता नहीं होता कि कौन देखेगा। कौन देख रहा होगा।समीउल्लाह साहब के देखने की इस गंभीरता ने झकझोर दिया है।

मैसेज भेजने वाले से बात करने लगा। बड़े पापा का नाम क्या है? पता चला कि समीउल्लाह साहब ने 45 साल ज्यामिति पढ़ाई है। इतने पुराने गणित के शिक्षक के सामने मेरी पेशी हो रही है। मुझे हर दिन ऐसी अनजान जगहों से कुछ न कुछ कहानी मिल जाती है। क्या लिखूँ और कहाँ लिखूँ। लेकिन एक रिटायर टीचर के घर का हाल लिखना ज़रूरी था। एक ऐसे समय में जब दर्शक के बारे में तरह तरह की कल्पनाएँ पेश की जा चुकी हैं इस तस्वीर में दिख रहे समीउल्लाह साहब टीवी के क्लासिक दर्शक हैं। ग़ाज़ीपुर दूर है। इसलिए कह भी नहीं सकता कि आ रहा हूँ। यह संभव भी नहीं है। फिर भी आपके दर्शक होने में जो श्रद्धा है, उसके आगे सर झुकाना तो बनता ही है। सर, मेरा प्रणाम स्वीकार करें।

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