एक तरफा मोहब्बत से सिवाय रुसवाई के कुछ हासिल नहीं

(सुमरा परवेज़)

“लाज़मी नहीं कि तुम भी चाहो मुझे,मैं इश्क़ हूँ एक तरफा भी हो सकता हूँ”

“मोहब्बत करनी है तो दो तरफा करो, एक तरफा में कुछ हासिल नहीं।” ये थी आयशा की दुनिया से रुखसत होते हुए दी गई आखरी सीख।
कल जाते-जाते आयशा एक बहुत स्ट्रांग मैसेज देकर गई है। खास तौर से हमारे 17- 18 साल के नौजवान लड़के और लड़कियों को।
जो किसी की हंसी को,किसी के बात करने को या किसी की हमदर्दी को मोहब्बत समझ लेते हैं।और बस उस पर अपना ही हक़ समझकर ग़लत कदम तक उठाने पर आमादा हो जाते हैं।
वो मोहब्बत नहीं आपके दिमाग का फितूर है जो आपको गुमराही और गुमनामी के सिवा कुछ नहीं देगा।
इस फितूर के चलते न जाने कितनी ज़िंदगियां बर्बाद हुई है।कितनी लड़कियों को इज़्ज़त गई है।
कितनी लड़कियां एसिड अटैक का शिकार हुई हैं। साथ ही कितने बापों ने अपने जवान बेटों को कांधा दिया है।
हमें ज़रूरत है अपने अंदर सलाहियत पैदा करने की। हमें ज़रूरत है अपने ज़हनों को खोलने की। काश आयशा की मोहब्बत एक तरफा न होती तो आज वो अपने माता पिता के बीच होती। जो उसे खुदा का वास्ता और क़ुरान की क़समें देकर घर वापस बुला रहे थे। जो रोकर,गिड़गिड़ा कर उससे उसकी ज़िंदगी की भीख मांग रहे थे। पर उस पर तो अपने उस शौहर की एक तरफा मोहब्बत का भूत सवार था, जिसने कह दिया था कि मरते वक्त विडियो बनाकर भेज देना।
और अपनी मोहब्बत में दीवानी एक मुस्कुराती हुई ज़िंदगी हमारे बीच से चली गई और ये नसीहत दे गई कि अब हमें ही बीड़ा उठाना होगा। हमें अपने आसपास के लोगों को देखना होगा और खासकर अपने घरों के बच्चों पर नज़र रखना होगा। उन्हें समझना होगा और ये काम हम लोग अपने घर से ही शरू कर सकते हैं। अपने बच्चों की बेहतर ज़िंदगी के लिए सही ग़लत को पहचानने की सलाहियत हमारी तवज्जो और हमारा वक्त ही दे सकता है। इसलिए अपनों और अपने करीबी लोगों का ख्याल रखिये ताकि कोई और बेटी अपनी ज़िंदगी को मामूली समझकर आयशा न बने।

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