गोदी मिडिया पर रवीश कुमार का तंज, बोले- क्या राजनीतिक पत्रकारों को चैनलों से निकाल देना चाहिए !

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नई दिल्ली: आप किसी भी समाचार संस्थान के अंदरूनी हालात का पता करें। रिपोर्टर नाम की नौकरी ख़त्म हो चुकी है। जिस तरह पाँच एंकरों को लेकर फ़ालतू डिबेट के नाम पर जगह भरी जाती है उसी तरह कभी-कभार हत्या, दुर्घटना, बीमारी, बाढ़ की रिपोर्टिंग के लिए चार पाँच रिपोर्टर ही रखे जाने लगे हैं। ज़माने से पेशे में नए रिपोर्टर नहीं आए हैं। कई चैनलों में तो राजनीतिक रिपोर्टर ख़त्म ही हो गए हैं। बीट रिपोर्टर समाप्त हो चुके हैं। सूचनाएँ बंद हो गई हैं। खुद से खोज कर लाएँगे तो राजनीतिक दल/सरकार अपने व्हाट्स एप ग्रुप से उसे बाहर कर देंगे। अब पार्टी का सूचना पर नियंत्रण हो चुका है। किस तरह की सूचना होगी वह पार्टी तय करती है और ट्विट कर देती है।
जो पत्रकार हैं वो बीजेपी का राग अलापने में लगे रहे और अपनी और अपने जगह किसी नए रिपोर्टर के आने की संभावनाओं को बंद कर दिया। अब उन बचे खुचे राजनीतिक रिपोर्टर के भी जाने के दिन आ गए हैं। लगातार बजट कम हो रहा है। इस प्रक्रिया में इन राजनीतिक संपादकों को निकाल दिया जाए तो चैनलों का पैसा बचेगा। बीजेपी का काम बीजेपी के पैसे से करो, चैनल के पैसे से क्यों कर रहे हो। दूसरा जब चैनल का मालिक ख़ुद ही बीजेपी का काम कर रहा है तो राजनीतिक पत्रकार पर पैसे क्यों ख़र्च करना। आख़िर मालिक ये काम पैसे के लिए ही तो कर रहा है।
इससे नए पत्रकारों के लिए काफ़ी जगह बन सकती है। जो राजनीतिक पत्रकारिता नहीं करेंगे। उसकी जगह विकास के मुद्दों को सामने लाएंगे। राजनीतिक पत्रकारों के लिए कोई काम नहीं बचा है। ये न्यूज़ रूम से ज़्यादा ट्विटर पर अपनी पार्टी और सरकार के पक्ष में तर्क गढ़ते रहते हैं। अगर ये राजनीतिक रिपोर्टर निकाल दिए जाएँ तो चैनल और अख़बार को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। इनसे एंकरिंग भी ढंग की नहीं होती है।
ट्विटर पर मौजूद राजनीतिक संपादकों और पत्रकारों की टाइम लाइन पर जाइये। पूछिए और पता कीजिए कि इन्होंने आख़िरी बार कौन सी ख़बर की है ? क्या वो खोज कर लाई गई ख़बर थी या कॉपी पेस्ट ख़बर थी। इन लोगों को खुद से भी काम करने का मन नहीं करता है। लेकिन ज्ञानस्रोत देंगे जैसे पत्रकारिता करते करते पसीने पसीने हो रहे हैं। मेरी बात का सार यह है कि पत्रकारिता नहीं होगी तो पत्रकार की ज़रूरत ही क्यों रहेगी?
न्यूज़ चैनल भी नहीं चाहते कि ये पत्रकारिता करें। इनके भांड में बदल जाने या इनकी जगह किसी और के भांड बनने के लिए तैयार रहने वालों के कारण चैनलों का काम आसान हो गया है। अब वे ख़बर कर किसी को असुविधा में नहीं डालना चाहते हैं इसलिए इन राजनीतिक पत्रकारों से नहीं पूछते कि आपने कौन सी ख़बर की। इस कारण बिना लागत के कंटेंट बनने लगे हैं। जैसा कि विनीत कुमार कहते हैं। बाक़ी ज़िलों क़स्बों की तरफ़ भी पत्रकारों का जाना बंद हो गया है। यह स्थिति जनता के भी हक़ में है। बीजेपी का वोटर और समर्थक नहीं चाहता है कि कोई उनके नेता को अपनी रिपोर्ट से घेर ले।
तो अब आप पूछेंगे कि चैनल क्या है?
जवाब: होर्डिंग हैं। जिस पर विज्ञापन और विज्ञापन के रूप में ख़बर चलती है।
फिर आप पूछेंगे कि दर्शक क्या है?
जवाब: बेवकूफ है। जो जानते हुए भी कि चैनल का काम ख़बर से नहीं रहा, ख़बर के नाम पर चैनलों को देखता है।

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