बीपीएससी में सीमांचल की दो बहनों शारबाह और सूबी मसूद ने बनाया रिकॉर्ड

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पटना: सीमांचल भले ही बिहार के पिछड़े इलाकों में गिना जाता हो, लेकिन यहां की नई पीढी इतिहास को बदलने में जुटी हुई है। सीमांचल की नई पीढी अपने इलाके के लिए नई इबारत लिख रही है। पूर्णिया की रहने वाली दो बहनों ने साबित कर दिया है कि अगर मौका मिले, तो इस पिछड़े इलाके की बेटियां भी कुछ बन कर दिखा सकती हैं।

हर साल बाढ़ में डूबने वाले इलाके बायसी के बिसहरी गांव की दो बेटियों शारबाह तरन्नुम और सूबी मसूद ने बीपीएससी की परीक्षा पास करके पिछड़े इलाके सीमांचल के इतिहास में नया अध्याय जोड़ा है। बड़ी बहन शारबाह तरन्नुम ने 64वें बीपीएससी में और सूबी मसून ने 65वें रेंक बीपीएससी की परीक्षा में सफलता हासिल की है। अब शारबाह अल्पसंख्यक कल्याण पदाधिकारी और सूबी लेबर एन्फोर्समेंट अधिकारी बनेंगी।

वैसे तो पूरा सीमांचल की देश के मानचित्र पर पिछड़ा हुआ है, उसमें भी बायसी का बिसहरी गांव उन इलाकों में आता है, जहां के लोग बेटियों की शिक्षा को लेकर जागरूक नहीं हैं। लेकिन बिसहरी के रहने वाले मो. मसूद आलम और उनकी पत्नी की सोच दूसरों से अलग है।

उन्होंने अपनी बेटियों को पढ़ने और आगे बढ़ने का मौका दिया। इसके बारे में शारबाह तरन्नुम कहती हैं कि उनकी मां हाजरा परवीन और पिता मसूद आलम ने अपनी बेटियों को कामयाबी का रास्ता दिखाया। बेटियों पर भरोसा किया, उनको मौका दिया, कमजोर पड़ने पर उनको मनोबल बढ़ाया।

माता और पिता के जागरूक होने के कारण ही उनकी दो बेटियां आज बीपीएससी की परीक्षा में हासिल कर इलाके के मान को बढ़ाया है। शारबाह ने तीसरे प्रयास में और सूबी ने पहले ही प्रयास में ये सफलता हासिल की है। सूबी मसूद कहती हैं कि उनकी सफलता की नींव उनकी मां ने रखी थी।

सूबी मसूद इससे पहले बीपीएससी द्वारा आयोजित इंजीनियरिंग की परीक्षा भी पास कर चुकी हैं. सूबी कहती हैं कि उनकी बड़ी बहन शारबाह पहले ही इसमें सफल हो चुकी हैं, उनकी सफलता ने उनको यहां तक पहुंचने में मदद की है… बड़ी बहन ने तैयारी करने में काफी मदद की और प्रेरित किया. शारबाह कुल्हैया बिरादरी से आती हैं… वो इस बिरादरी की पहली बेटी, जिन्होंने बीपीएससी की परीक्षा पास की है.

उनके पिता मसूद आलम लाइन बाजार के नया टोला में रह रहे हैं. वो कहते हैं कि दूसरे लोगों को अपनी बेटी को पढ़ने और आगे बढ़ने का मौका देना चाहिए. सरकार भी तो यही कर रही है कि बेटी पढ़ाओ. अगर बेटियों को मौका दिया जाए, तो वो किसी भी परीक्षा में सफलता पा सकती हैं.

शारबाह पहले दो प्रयास में 18 और 13 नंबर से पिछड़ गई थीं, लेकिन तीसरे प्रयास में उन्हें सफलता मिली. वो कहती हैं कि हार नहीं मानना चाहिए. अपने लक्ष्य को पाने के लिए लगातार प्रयास करने की जरूरत है. वो कहती हैं कि वो अपनी सफलता से खुश हैं, लेकिन संतुष्ट नहीं हैं. वो तब तक हार नहीं मानेंगी, जब तक उनको एसडीएम का पद नहीं मिल जाता है. शारबाह ने मैट्रिक तक की पढ़ाई उर्स लाइन कांवेंट स्कून् से पास की. उसके बाद इंटर एसएम कॉलेज भागलपुर से किया. पीजी करने के बाद तैयारी करने के लिए पटना गईं फिर से वहां दिल्ली.

सूबी मसूद ने उर्स लाइन कांवेंट से मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद बारहवीं की परीक्षा डीएवी पब्लिक स्कूल से पास की. उसके बाद उन्होंने गया कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से बीटेक की परीक्षा पास की. उन्होंने पहले ही प्रयास में बीपीएससी द्वारा आयोजित सिविल इंजीनियरिंग की भी परीक्षा पास की थी. सूबी अपनी पढ़ाई के बारे में कहती हैं कि उन्होंने कभी कोचिंग नहीं ली. उन्होंने कहा कि अगर आपको अपने ऊपर भरोसा है, तो कोचिंग की जरूरत नहीं है.

शारबाह तरन्नुम के बीपीएससी का रिजल्ट 6 जून को आया था. उसके बाद जुलाई में सूबी मसूद के इंजीनियरिंग की परीक्षा का रिजल्ट आया और अब 7 अक्तूबर को सूबी मसूद के बीपीएससी का रिजल्ट आया है. शारबाह तरन्नुम कहती हैं कि उनको अल्पसंख्यकों के लिए कुछ करने का मौका मिला है. वो जिस भी इलाके में रहेंगी, वहां पर अल्पसंख्यक लड़कियों की शिक्षा के लिए काम करेंगी. उनको पढ़ने और आगे बढ़ने का मौका देंगी.

उन्होंने कहा कि शिक्षा से बड़ी दौलत कुछ नहीं है. आप अपनी बच्चों को लाखों की दौलत मत दो, बस उन्हें पढ़ा दो. वो अपना रास्ता और लाखों की दौलत खुद बना लेंगे. अल्पसंख्यक समुदाय के अलावा दूसरे लोगों को भी इस बात को समझने की जरूरत है. वो कहती हैं कि सरकार सब के लिए योजनाएं लाती हैं, लेकिन उसे घर-घर नहीं पहुंचाया जा सकता है. लोगों को जागरूक होना होगा. तभी वो खुद को और अपने परिवार और कौम को बेहतर भविष्य दे सकते हैं.

इन बेटियों की सफलता पर कुल्हैया डेलपमेंट अथॉरिटी के सचिव तनवीर मुस्तफा कहते हैं कि ये सच है कि शारबाह पहली बेटी हैं, जिन्होंने बीपीएससी की परीक्षा पास की है. उनका कहना है कि इससे पहले उनके इलाके के लोग पहले घर बनाने और गाड़ी खरीदने में पैसे खर्च करते थे, लेकिन अब दूसरे खर्च में कटौती कर बच्चों को पढ़ाने में खर्च करेंगे. मुस्लिम समाज में शिक्षा के प्रति एक साकारात्मक बदलाव देखने को मिलेगा…

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