देश में शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधा अब दानवीरों के भरोसे है,सरकार ये सब नहीं करने वाली, सरकार बस हिन्दू-मुस्लिम करेगी

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पढ़ाई के लिए आम बेच रही तुलसी को किसी उद्यमी ने सवा लाख रुपये दिए, ठीक है। लेकिन भारत के उन करोड़ों बच्चों का क्या जिन्होंने स्कूल का मुंह ही नहीं देखा है? उन बच्चों का क्या जो अभाव के चलते बेसिक शिक्षा भी पूरी नहीं कर पाते और ड्रापआउट का शिकार हो जाते हैं?

एक बच्ची को किसी ने दान कर दिया और पूरा भारत मगन है कि हाय, हम कैसे दानवीरों की धरती पर पैदा हुए। ऐसे फर्जी उत्सव मनाने का एक फायदा ये भी है कि हमें करोड़ों वंचितों के बारे में बात नहीं करनी पड़ती।
भारत में 2018 तक 3.22 करोड़ बच्चे स्कूल से बाहर थे। ये बच्चे 6 से 17 साल की उम्र वाले हैं। इसके बाद महामारी आई और तबसे पूरा देश घर पर बैठा है। करोड़ों बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई का फायदा नहीं उठा सकते क्योंकि उनके पास मोबाइल नहीं हैं। अनुमान है कि महामारी से पहले जितने बच्चे स्कूल से बाहर थे, उनकी संख्या दोगुनी हो सकती है। गरीब-मजदूर परिवार जो अपने बच्चों को किसी तरह पढ़ाते हैं, उनका रोजगार चला गया और उनके बच्चों का स्कूल छूट गया। ऑनलाइन पढ़ाई का फायदा सिर्फ वे बच्चे उठा पा रहे हैं जिनके मां-बाप स्मार्टफोन अफोर्ड कर सकते हैं। लेकिन सबसे बड़ी चिंता उस आबादी की है जो गरीबी से निकलकर मध्यवर्ग में शामिल हो रही थी और दोबारा गरीबी रेखा के नीचे चली गई। भारत मे कम से कम 23 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे चले गए हैं।
क्या पिछले दो साल में आपने सरकार की ओर से इन बच्चों के बारे में कोई चर्चा, कोई नीति, कोई योजना सुनी है?
भारत में शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधा अब दानवीरों के भरोसे है। कोई ऑक्सीजन दान कर दे, कोई वेंटिलेटर दान कर दे, कोई अस्पताल बनवा दे। सरकार ये सब नहीं करेगी। सरकार बस हिन्दू-मुस्लिम करेगी।
वे तो ऐसा कुर्सी के लिए कर रहे हैं, मगर आप अपने बच्चों और अपने देश का भविष्य क्यों बर्बाद कर रहे हैं?

ये लेख पत्रकार कृष्णा कांत के वाल से साभार लिए गया है

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