बेटे को पुलिस ने मारी गोली,बाप से कहा किसी मुस्लिम का नाम ले लो,10 लाख मिलेंगे,

नई दिल्ली: 2 अप्रेल 2018 का भारत के इतिहास में सबसे बड़ा भारत बंद साबित हुआ था ,जिसमें उग्र होकर दलित समाज ने सड़को पर विरोध प्रदर्शन किया था जिसमें कई की मौत और दर्जनों घायल हो गए थे इस भारत बंद में अपने बेटे को खोने वाले सुरेश कुमार ने आज खुलासा करते हुए कहा है कि उनके बेटे को एक पुलिस अधिकारी ने गोली मार दी और बदले में उनसे कहा गया कि वह दलित युवक के हत्यारे के रूप में किसी भी मुस्लिम शख्स का नाम ले लें। इसके बदले में उन्हें दस लाख रुपए की पेशकश की गई।

ऐसे ही एक और पुलिस की गोली का शिकार हुए दिहाड़ी मजदूर कहते हैं कि उन्हें भाजपा सरकार से किसी मुआवजे की उम्मीद नहीं है। कुमार कहते हैं कि पुलिस की गोली लगने की वजह से वह अब मजदूरी करने में भी सक्षम नहीं हैं।

दरअसल रविवार (13 जनवरी, 2019) को रामलीला मैदान में इकट्ठा हुए बहुत से दलितों ने अन्याय और कठिनाईयों की कई कहानियां बताईं। ये वो लोग जिन्होंने 2 अप्रैल, 2018 को भारत बंद में किसी ना किसी रूप से हिस्सा लिया और प्रशासन की क्रूरता का शिकार हुए। इस विरोध प्रदर्शन में 13 लोगों की जान चली गई जबकि दो हजार से ज्यादा लोग घायल हो गए। रामलीला मैदान इन्हें लोगों के परिजनों को बहुजन सम्मान महासभा में सम्मानित किया गया।

द टेलीग्राफ में छपी एक खबर के मुताबिक उस दिन हड़ताल के दौरान पुलिस गोलीबारी में दस लोगों की मौत हो गई। ये लोग अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम में सुप्रीम कोर्ट के बदलाव के खिलाफ विरोध कर रहे थे। विरोध के दौरान एक बच्ची की मौत जलती बाइक में गिरने की वजह से हो गई।

इसके अलावा दो लोगों की मौत कथित तौर पर ऊंचि जाति द्वारा दो दिन बाद हिंसा में हो गई थी। रामलीला मैदान के आयोजन में 13 ‘शहीद भीम सैनिकों’ की मूर्तियां लगाई गई हैं। यह आयोजन गाजियाबाद के सत्यशोधक संघ, भीम आर्मी के एक गुट द्वारा आयोजित किया गया। इन मूर्तियों को बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर, बुद्ध और सम्राट अशोक की बड़ी मूर्तियों के सामने रखा गया जिन्हें बाद में पीड़ितों के मूल स्थानों पर ले जाया जाएगा।

यूपी के मुजफ्फरनगर स्थित गोडला गांव में रहने वाले सुरेश कुमार (60) ने बताया कि कैसे उस दिन हड़ताल के दौरान उनके 22 वर्षीय बेटे अमरेश की मौत हो गई। पेशे मजदूर सुरेश कहते हैं, ‘वो भी मेरी तरह दिहाड़ी मजदूर था और शहर में काम की तलाश में गया था। काम नहीं लगा तो मुजफ्फरनगर रेलवे स्टेशन पर आ गया, जहां हमारे (जाटव) कुछ लड़के प्रदर्शन कर रहे थे।’ सुरेश कहते हैं, ‘हमारे लड़कों ने बताया कि उसे एक पुलिस अधिकारी ने सीने पर गोली मारी थी। प्रदर्शनकारी इसे हाथ से चलने वाले ठेले पर सरकारी हॉस्पिटल में लेकर गए, लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका।’

सुरेश की एक बेटी और दो बेटे और हैं, जो दिहाड़ी मजदूरी का काम करते हैं। उन्हें सरकार ने किसी तरह का मुआवजा नहीं दिया। सुरेश ने दावा किया बेटे की मौत का आरोपी पुलिस इंस्पेक्टर उन्हें न्यू मंडी पुलिस स्टेशन उठाकर ले आया। सुरेश कहते हैं, ‘उन्होंने मुझसे बेटे के हत्यारे के संदिग्ध के रूप में किसी भी मुस्लिम शख्स का नाम लेने को कहा। कहा गया कि अगर मैं ऐसा करता हूं तो इसके बदले में मुझे दस लाख रुपए का मुआवजा मिलेगा। मैंने इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि मैं शांति चाहता हूं तो किसी का तो नाम लेना ही पड़ेगा। इसपर मैंने उस पुलिसवाले कहा कि मैं जानता हूं कि तुमने ही मेरे बेटे को मारा है।’

सुरेश आगे कहते हैं, ‘मेरे इनकार के बाद मुझे जातिगत गालियां दी गई, बाहरी व्यक्ति कहा गया। मुझे पीटने की धमकी दी गईं। मैंने उसे चेतावनी दी कि उसकी शिकायत करुंगा। इसके बाद पुलिस ने एक दलित युवक राम शरण को उस हिंसा के आरोप में गिरफ्तार कर लिया जिसमें अमरेश की मौत हुई।’ सुरेश आगे कहते हैं, ‘मैं अपने बेटे के लिए इंसाफ की लड़ाई नहीं लड़ सकता। हमारे किसी पड़ोसी ने भी हमारी मदद नहीं की।’

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