किसी पत्रकार से सुना आज 60वां किसान भी ‘किसान एकता जिंदाबाद’ के नारे लगाते हुए हमेशा के लिए सो गया

मौसम विभाग का कहना है अगले तीन दिन दिल्ली में यूं ही बारिश होनी है. कभी टपटप कभी झरझर. OOOoooo It’s Raining, What a Sexy weather कहती दिल्ली के बॉर्डर पर किसानों के सर से आज 39वां सूरज ढह गया है. हिंदी के अख़बार में नहीं पर, किसी पत्रकार से सुना आज 60वां किसान भी ‘किसान एकता जिंदाबाद’ के नारे लगाते हुए हमेशा के लिए सो गया. उसकी आंखें मुंद गईं इस इंतजार में कि शायद मुल्क की सरकार या जनता में से कोई एक जगें. एक किसान मरने से पहले लिखकर छोड़ गया कि किसानों के लिए न्याय मिल जाए इसलिए अलविदा कह रहा हूं. कितना भोला था किसान जिसे ये लगता था कि अगर उसने आत्महत्या कर ली तो सरकार मान जाएगी. उसके मुर्दा शरीर से लिपटे किसान संघ के झंडे के ऊपर रखे ‘सुसाइड नोट’ को देखकर क्या-क्या न ख्याल आया.
सुसाइड नोट छोड़कर मरने वाले किसान को क्या इतना भी मालुम न था कि सरकार को जागने के लिए 60 की संख्या कम है. जिस पगडंडी से संसद के हॉल में न्याय की शपथ ली थी, उस तक पहुंचने में 2002 लोगों को कुचल दिया गया. फिर उससे उतरने के लिए 60 की जान लेना कुछ कम नहीं है? क्या इतना भी गणित वह किसान न जानता था.
39 सूरज डूब जाने के बाद, 60 किसानों की जान जाने के बाद, आज 8वीं वार्ता हुई. इस दिन भी सरकार कृषि कानूनों के फायदे गिनाती रही. 39 दिन तक सड़क पर शीत सहने वाले किसान को कृषि कानूनों के फायदे गिनाने वाली सरकार की इस अदा पर कौन न मर जाए? अख़बारों में करोड़ों के विज्ञापनों और गांव-गांव में रैलियों, प्रधानमंत्री के बोझिल उद्बोधनों के बाद भी कोई जगह बच गई थी सो कृषि कानूनों के फायदे गिनाने के लिए 8वीं वार्ता को चुना. पहली वार्ता में किसानों के वही सवाल थे, सरकार के वही जवाब थे. दूसरी में किसानों के वही सवाल, तीसरी, चौथी, पांचवी, छठी, सातवीं में भी वही सवाल. फिर आठवीं वार्ता क्यों बुलाई जब कृषि कानूनों के फायदे ही गिनाने थे और बात नहीं माननी थी. अब फिर कह दिया कि 8 तारीख को मिलते हैं, 9 वीं वार्ता के लिए.
39 दिन बीत गए साहब, अब तो मान जाइए. कर लीजिए अपना ईगो थोड़ा सा ढीला. अगर किसानों पर प्रधानमंत्री की विजय ही करनी है तो ये 2 मिनट का मौन कैसा? कहीं 60 किसान मरते, और मंत्री मौन रखते तो ये देश इतना भावुक है कि अब भी रो देता. पर ये 60 मौत नहीं, 60 हत्याएं हैं, और आप इन हत्याओं पर मौन कैसे कर रहे हैं. क्या आप नहीं जानते किस चीज के इंतजार में ये किसान मर गए. इनका हत्यारा कौन है क्या आप नहीं जानते?
आपकी जिस तस्वीर पर पिघलकर आपको गले लगाने का मन हो आता, उन आँखों को आपकी ये तस्वीरें साल की सबसे अश्लील तस्वीरें लग रही हैं. आपको सर झुकाकर किसानों के लिए मौन रखता देख, किसी की कही कुछ पंक्तियों का ख्याल बार-बार आ रहा है ‘कि सियासत इस कदर आवाम पर अहसान करती है, आँखें छीन लेती है, और चश्मे दान करती है.”
shyammeerasingh
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