9 साल पहले की तारीख़ से मेरी वेबसाइट पर पोस्ट प्लांट कर मुझे बदनाम करने की कोशिश की गई।

(नोट- यह लंबा लेख है मगर आपसे गुज़ारिश है कि पूरा पढ़ें और समझें कि मेरे ख़िलाफ़ कैसी साज़िशें हो रही हैं)

14 मई को डॉक्टर राजू रंजन प्रसाद ने अपने फेसबुक पेज पर मेरी वेबसाइट NAISADAK.ORG का एक लिंक पोस्ट किया। डॉ राजू रंजन प्रसाद ने बस इतना पूछा कि ये कौन रवीश कुमार हैं जो मेरे लेख को हवा हवाई समझ बांट रहे हैं। उन्हें जिज्ञासा रही होगी कि जब लेख पोस्ट ही किया है तो उनका नाम यानी क्रेडिट भी दे देता। यह ठीक बात भी है। राजू रंजन प्रसाद जी के लेख का शीर्षक है बिहार: सुशासन की हवा-हवाई मिठाई। उन्होंने कई लोगों को अपना पोस्ट टैग कर दिया। रवीश कुमार को नहीं जानते थे मगर रवीश कुमार के दोस्तों के बारे में पता था इसलिए टैग कर रहे थे। मुझे पता है कि मेरा नाम मेरे लिए ही नहीं दूसरों के लिए भी जंजाल हो गया है। कुछ लोग गरिया कर और औकात दिखाकर भी संतुष्टि पाते हैं। मुझे अपनी इस उपयोगिता पर हंसी भी आती है। ख़ैर।

जब मेरे मित्रों ने इस पोस्ट के बारे में ध्यान दिलाया तो वाकई कुछ समझ नहीं आया। NAISADAK.ORG पर दिख भी रहा था कि यह लेख 17 जुलाई 2010 को पोस्ट किया गया है। पोस्ट करने वाले में मेरा नाम था। जब मित्रों ने लेख पढ़ा और ख़ुद मैंने भी तो लगा कि यह मेरी भाषा नहीं है। 9 साल पुराने पोस्ट के बारे में कुछ याद नहीं आ रहा था।

तभी ध्यान आया कि 9 साल पहले कस्बा एक ब्लागस्पाट था। वेबसाइट नहीं। डॉ राजू रंजन प्रसाद ने जो लिंक डाला है वो वेबसाइट का है। यह कैसे संभव है? मित्रों ने याद दिलाया कि मैं कस्बा ब्लॉग पर दूसरे लोगों का भेजा हुआ लेख डालता था। तो डॉ राजू रंजन प्रसाद का भी लेख पोस्ट हो गया होगा। उस समय पोस्ट करने वाले की जगह मेरा ही नाम आ जाता था। तब मैं नीचे या लेख के पहले ही ब्रैकेट में लेखक का नाम लिख दिया करता था। मुझे लगा कि शायद लेखक का नाम लिखना भूल गया होगा। यह चूक हुई होगी मुझसे। क्योंकि आप जानते हैं कि मैं यूं ही किसी की कोई सामग्री लेता हूं तो सोर्स बताता हूं। किस अख़बार का, किस तारीख़ का, किस रिपोर्टर का है। यह मेरे काम करने का हिस्सा है। न्यूज़ चैनल पर भी करता हूं और अपने पोस्ट में भी।

मुमकिन है कि कभी छूट भी गया हो लेकिन उसका अफसोस रहता है। हम भी इंसान हैं। वैसे ये एकाध बार ही हुआ होगा। फिर भी मेरा मन नहीं माना। मैं किसी का लेख चोरी करूं और उसे अपने नाम से लिखूं यह हो ही नहीं सकता है। तो ज़ाहिर है जो मित्र टेक्नालजी को समझते हैं उनसे संपर्क किया गया। अब ये बात डा राजू रंजन प्रसाद और आप सभी को ध्यान से सुनना चाहिए। पढ़ना चाहिए और जो स्क्रीन शाट पोस्ट कर रहा हूं उसे देखना भी चाहिए।

मेरी वेबसाइट पर डॉ राजू रंजन प्रसाद का लेख प्लांट किया गया था। 2016 में किसी ने वेबसाइट हैक कर इस लेख को प्लांट कर दिया। कोई पीछे जाकर चेक तो करता नहीं। लिखा, पोस्ट किया और भूल गया। कस्बा जब ब्लाग था तो उसकी आर्काइव में जाकर चेक किया तो पता चला कि जुलाई 2010 में मैंने कुल 12 पोस्ट किए हैं जिसमें से डॉ राजू रंजन प्रसाद का लेख नहीं है। आप उसकी सूची का स्क्रीन शाट देख सकते हैं। 2010 में कस्बा NAISADAK.ORG वेबसाइट नहीं था तो उस तारीख में वेबसाइट पर कैसे पोस्ट हो गया। पहला शक और सबूत यह बन गया।

डॉ राजू रंजन प्रसाद ने अपनी वेबसाइट का स्क्रीन शाट और लिंक दिया। चूंकि लेख उनका था तो पब्लिश करने का समय भी दर्ज हो गया। 17 जुलाई 2010 की तारीख से मेरी वेबसाइट पर उनका लेख पब्लिश होता है मगर समय नहीं है। ये हैरान करने वाली बात थी। आप जानते हैं कि कोई भी पोस्ट करने पर समय ज़रूर आता है। यह पकड़ में आ चुका था। जब मेरे मित्र ने कहा कि यह प्लांट है तो समझ नहीं आया कि क्या हो रहा है।

अब इस तकनीक को समझने वाले मित्र आश्वस्त हो चुके थे कि ये प्लांट हैं। बकायदा उन्होंने मेरा 13 मई 2019 को लिखा हुआ पोस्ट 14 मई 2009 की तारीख में पोस्ट कर साबित कर दिया। उसके लिंक का भी स्क्रीन शाट दे रहा हूं। मेरी वेबसाइट को पहले एकाध बार हैक किया जा चुका है। आपको पता ही है मगर अब याद नहीं होगा। कितनी चीज़ें याद रखेंगे।

यही नहीं जिसने भी डॉ राजू रंजन प्रसाद का लेख मेरी वेबसाइट पर प्लांट किया उसने उस लेख का कमेंट बाक्स बंद कर दिया। आप लाल घेरे वाले बक्से से समझ सकते हैं। उसके ठीक ऊपर के लेख में काफी कमेंट हैं। बिहार-सुशासन की हवा-हवाई मिठाई वाले लेख में एक भी कमेंट नहीं है। कमेंट का बक्सा बंद है।

पता चलता है कि 2016 में इसे मेरी वेबसाइट पर प्लांट किया गया था। मगर बीच बीच में इसे कोई चेक कर रहा था। मानिटर कर रहा था कि लिंक वहां है या नहीं। शायद आगे जाकर कोई बड़ा खेल करने का इरादा रहा होगा। मुझे बदनाम करने के लिए। मगर तकनीकि से यह भी जाना जा सकता है कब कब इस लिंक को चेक किया गया है। । मई 2017 में दिखा रहा है कि दो यूज़र ने इस लिंक को क्लिक किया है। इसके बाद अगस्त 2018 में दो यूज़र उस लिंक को चेक करते हैं। क्लिक करते हैं। इन दोनों का भी स्क्रीन शाट है। आप देख सकते हैं। जब ख़बर उड़ती है कि मैंने किसी का लेख बग़ैर क्रेडिट दिए छापा है तो अचानक से इस लेख पर ट्रैफिक बढ़ती है। उसका भी स्क्रीन शाट है। आप देख सकते हैं कि किनारे पर ग्राफ में उछाल आ जाता है। 13 मई को ट्रैफिक बढ़ता है। उसके पहले कोई नहीं देखता है।

तो मुझे बदनाम करने के लिए कोई तीन साल से प्लानिंग कर रहा था। अब मुझे नहीं पता कि मुझे लेकर क्या क्या प्लानिंग हो रही है। कब कौन से आरोप लगा दिए जाएंगे। मैं अपनी तरह से हर एहतियाहत बरतता हूं लेकिन जब इतनी बड़ी ताक़त मेरी जान और नाम के पीछे पड़ी हो तो क्या किया जा सकता है। मेरे परिवार के लोगों को इसी तरह से साज़िश कर फंसाया गया। सोशल मीडिया में बदनाम किया गया। उसकी कहानी फिर कभी। लेकिन मैं झेलता चला गया। आप इस घटना के सिक्वेंस से समझ सकते हैं कि मेरे लिए योजनाएं तीन तीन साल बनी हुई हैं। मैं कितना सावधान रह सकता हूं। कितना आसान है किसी को सामने लाकर आरोप लगवा देना। उसके बाद बहस ही तो करनी है।

एक बात है। मैं अपने नाम को लेकर डरा नहीं रहता। कि कोई ब्लैक मेल कर लेगा, या मिट जाएगा। मैंने खुद कई बार लिखा है कि मुझसे दूर रहें। मुझे न सभाओं में बुलाएं और न ही बधाई दें और न ही रवीश कुमार बनें और न ही रवीश कुमार का फैन बनें। यह सब लिखा है और बोला है। ये तब बोला है कि जब मुझे सुनने के लिए बड़े बड़े हॉल में हज़ारों लोग पहुंचे।

और न ही अपने नाम का इस्तमाल अपने प्रचार में किया है। न जाने कितनी किताबों का दाम और प्रकाशन समेत ज़िक्र किया है। जानने वाले जानते हैं कि न्यूज़ चैनल पर और अपने पेज पर कोई ऐसा नहीं करता है। मैं ऐसे कई लेखकों को जानता हूं जिनकी टाइम लाइन से यही पता चलता है कि दुनिया में उनकी किताब के अलावा कोई दूसरी किताब ही नहीं लिखी गई। जानने वाले यह भी जानते हैं कि जब मैंने उनकी किताब का ज़िक्र किया तो हफ्ते भर में कई हज़ार कापी बिक गई। यह शेखी के लिए नहीं बल्कि सीखने के लिए बता रहा हूं। अच्छी किताबों का प्रसार करना चाहिए। इससे दुनिया अच्छी होती है। दूसरो की किताब का ज़िक्र करने से मैं ख़ुद को सुरक्षित महसूस करता हूं। मेरे भीतर असुरक्षा की जगह कम बचती है। मेरे साथ काम करने वाले रिपोर्टर, स्ट्रिंगर, कैमरामैन सब जानते हैं। किसी का छूट गया तो बकायदा सॉरी भी कहा है।

सोचिए, अगर मेरे पास तकनीकि समझ वाले मित्र नहीं होते तो क्या कुछ हो गया होता। यहां पर बैठे लोग मुझे चोर साबित कर देते। उन्हें पता है कि आए दिन मेरे नाम से कई फेक चीज़ें बनाई जाती रही हैं। इन सबको उन फेक चीज़ों को सच मान लेना चाहिए और धान के खेत में कूद जाना चाहिए। यह जानकर कि मैं सत्यवादी नहीं रहा। जैसा मेरा सत्यवादी होना ही उनके सत्य के लिए सबसे ज़रूरी थी। वे अपने सत्यवादी के सत्य का सामना नहीं कर सके। डॉ राजू रंजन प्रसाद का भी शुक्रिया कि उन्होंने बात का बतंगड़ नहीं बनाया। मेरी तो हालत ये है कि रेड लाइट क्रास कर जाऊं तो नैतिकता पर व्याख्यान लिखे जाएंगे। कल ही अपील की थी कि प्रमोशन, जन्मदिन पुरस्कार पर बधाई न दें।

यह इसलिए बताया कि थोड़ा भरोसा रखिए। मुझे फंसाने के लिए बहुत सी योजनाएं हैं। इतनी जल्दी हिल जाएंगे और नैतिकता बघारने लगेंगे तो कैसे काम चलेगा। हां ज़रूर एक बात कहना चाहता हूं कि कभी रवीश कुमार मत बनिएगा। ( यह भी लिखा है वैसे) मैं जानता हूं कि रवीश कुमार बनने के लिए क्या क्या झेलना पड़ता है। मुझे भी हक है कि सामान्य जीवन जी लूं। आप सभी को यह लेख याद रखना चाहिए। जब देश की इतनी बड़ी पार्टी एक पत्रकार का बहिष्कार करे, तो समझना चाहिए कि वह किन ख़तरों में जी रहा होगा। अब प्रधानमंत्री झूठ और बोगस बात कर देते हैं तो मैं क्या करूं। एक्सपोज़ तो कर ही दूंगा। मगर आप ख़ुद को एक्सपोज़ न करें। हर समय मेरे मारे जाने या बदनाम हो जाने का आत्मसुख हासिल करने की चाहत आपको भी वैसा ही बना चुकी है। जय हिन्द।

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