उसी का शहर, वही मुद्दई, वही मुंसिफ़, हमें यकीं था, हमारा कुसूर निकलेगा:सौमित्रा रॉय

उमर ख़ालिद,, आखिर कब तक आवाज़ उठाने वालों पर ज़ुल्मो सितम करती रहेगी हुकूमत, भड़काऊ भाषण देने वाले कपिल मिश्रा बाहर खुले में घूम रहे है और एक के बाद एक बेगुनाह लोग दिल्ली दंगे के नाम पर जेल में भरे जा रहे है,, जिन्होंने अपना सब कुछ खो दिया आज वही दिल्ली दंगे के साजिशकर्ता बताए जा रहे हैं। 30 साल की उम्र के 17 लोगों पर दिल्ली पुलिस यू ए पी ए लगा चुकी है और उनका कुसूर बस यह था कि वे नागरिकता कानून संशोधन के खिलाफ थे।

कल देर रात 11 घण्टे की पूछताछ के बाद उमर खालिद को दिल्ली दंगों के मुख्य साजिशकर्ता के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। उमर पर दो बार जानलेवा हमले हो चुके हैं, सो उनकी सुरक्षा एक महत्वपूर्ण मसला है लेकिन उमर की गिरफ़्तारी दिल्ली पुलिस पर हुकूमत करती मोदी सरकार के मंसूबों को साफ साफ दिखाती है।

 

यानी, देवता को घोडे की नहीं, हाथी की नहीं और व्याघ्र की भी बलि नहीं दी जाती है। केवल बेचारे बकरे की ही बलि दी जाती है। सचमुच देवता भी दुर्बल प्राणी के लिये ही घातक सिद्ध होते हैं। जब पुलिस ही आरोपी हो और पुलिस ही अपनी भूमिका की जांच करेगी तो बकरे ही ढूंढे जाएंगे।

 

दिल्ली में पुलिस की सुनियोजित मिली-भगत से सामूहिक नरसंहार के मामले में उमर खालिद की गिरफ़्तारी यही बताती है। दिक्कत यह है कि “देवता” को किसी भी सूरत में यह दिखाना है कि नफ़रत के ख़िलाफ़ एकजुट हुए लोगों ने ही नफ़रत को हवा दी है। योगेंद्र यादव, जयति घोष, अपूर्वानंद, सीताराम येचुरी को भी दिल्ली पुलिस हिंसा भड़काने के लिए ज़िम्मेदार मानती है।

अभी उमर ख़ालिद को निशाना बनाया गया है। वज़ह सब जानते हैं। अलबत्ता, गोली मारो गैंग का सरगना, हवा में तलवारें घुमाती भीड़ को उकसाने वाली “देवीजी” और भीड़ पर पिस्तौल तानने वाला आज़ाद है। पुलिस को वह कोमल शर्मा भी मासूम दिखाई देती है, जो हाथ में डंडे लिए JNU में घुसी थी। दिल्ली पुलिस की मेहरबानी से सब आज़ाद हैं।

रिया चक्रवर्ती के मामले में भी यही हुआ। जब यह साबित हो गया कि सुशांत ड्रग एडिक्ट था और अपनी मौत मरा तो ख़ुद की पीठ थपथपाने के लिए रिया की बलि ली गई। इन गुनाहों में दिल्ली पुलिस ही दोषी नहीं है, ये समाज भी है। मुझे पूरा यकीन है कि बहुसंख्यक कौम इस मामले में दिल्ली पुलिस के साथ है। विपक्ष की सियासत भी। यही है आज का भारत। यही है आज का निज़ाम।

अमीर कज़लबाश ने क्या खूब लिखा है-

उसी का शहर, वही मुद्दई, वही मुंसिफ़,
हमें यकीं था, हमारा कुसूर निकलेगा।

उमर की गिरफ़्तारी यह भी बताती है कि चुनाव आ गए हैं। सियासी बयार मोदी सरकार की तमाम नाकामियों को उजागर करने वाली आवाज़ों को फिर भगवा-हरे रंग में रंगने की कोशिशें होंगी। गोदी मीडिया चुनाव से पहले फैसला सुनाएगा। अदालतें गवाही देंगी और निज़ाम देश की बहुसंख्यक अवाम को फिर मूर्ख बनाने, मज़हब के नाम पर बांटने की साज़िश में जीत का अट्टहास लगाएगा।

देश इसी तरह कुछ दिनों में अफ़ग़ानिस्तान, सूडान के बराबर हो जाएगा। लेकिन उस घास को उगते रहने से कोई नहीं रोक पायेगा, जिसके बारे में पाश कहकर गए हैं:

मैं घास हूँ
मैं आपके हर किए-धरे पर उग आऊँगा

बम फेंक दो चाहे विश्‍वविद्यालय पर
बना दो होस्‍टल को मलबे का ढेर
सुहागा फिरा दो भले ही हमारी झोपड़ियों पर
मुझे क्‍या करोगे?
मैं तो घास हूँ, हर चीज़ ढंक लूंगा
हर ढेर पर उग आऊँगा

बंगे को ढेर कर दो
संगरूर को मिटा डालो
धूल में मिला दो लुधियाना का ज़िला
मेरी हरियाली अपना काम करेगी…
दो साल, दस साल बाद
सवारियाँ फिर किसी कंडक्‍टर से पूछेंगी –
“यह कौन-सी जगह है?
मुझे बरनाला उतार देना
जहाँ हरे घास का जंगल है।”

मैं घास हूँ, मैं अपना काम करूँगा
मैं आपके हर किए-धरे पर उग आऊँगा।

………………….सौमित्रा रॉय

Donate to JJP News
अगर आपको लगता है कि हम आप कि आवाज़ बन रहे हैं ,तो हमें अपना योगदान कर आप भी हमारी आवाज़ बनें |

Donate Now

loading...