मूसलाधार बारिश में दरिया बन गया यूपी ,कई जिले में कमर तक भरा पानी ,लोग परेशान

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उतर प्रदेश: ऐसे ही धीरे-धीरे हर शहर और महानगर की बारी आएगी। हमें लगेगा कि दूसरे शहर की घटना है लेकिन वो हमारे शहर भी आएगी। 2005 में मुंबई में आई बाढ़ से क़रीब हज़ार लोग मर गए थे। बीच शहर में डूब कर मर गए। 2015 में चेन्नई में बाढ़ गई तो ऐसे लोग भी डूब कर मर गए जो अपने मकानों की दूसरी मंज़िल पर थे। वहाँ तक पानी भर गया था। 2018 में केरल में भयंकर बाढ़ आई। सितंबर 2019 में पटना में बाढ़ आ गई । 30 लोग मर गए। पटना के अमीर लोगों के मोहल्ले का घर डूब गया। पहली मंज़िल के नीचे चल रहे डॉक्टरों की क्लिनिक का सामान ख़राब हो गया। अब आप गोरखपुर की ये ख़बर देख रहे हैं। बुंदेलखंड में बाढ़ आई, वहाँ क्या हुआ आपको पता भी नहीं है।
बेशक जलवायु परिवर्तन तो कारण है ही, इससे भी बड़ा कारण है कि हर साल जगह बदल कर आने वाली इस तबाही का सामना करने के लिए कुछ भी नहीं है। शहरों के नाले बंद पड़े हैं। पंपिंग सेंटर का हाल बुरा है। नदियों के बहाव क्षेत्र का हर जगह अतिक्रमण हो चुका है। सामान्य से ज़्यादा बारिश में शहर में पानी भर जाता है और फिर ये जो हालत देख रहे हैं गोरखपुर की, वही हो जाता है। अगर पंपिंग सेंटर ठीक भी होते तो उससे क्या हो जाता। पानी निकल कर कहां जाता। जिन जगहों पर पानी को जाना था वहाँ तो मकान बन चुके हैं। कुछ लोग खुश हो लेंगे कि देखो योगी जी का विकास। अपना ही शहर नाले में बह रहा है।योगी जी की असफलता तो है ही लेकिन डूबने से पहले क्या गोरखपुर के लोगों ने इसकी परवाह की थी कि नदियों और तालाबों पर किस तरह क़ब्ज़ा हो गया है। क्या वे नहीं जानते हैं कि इसका जनजीवन पर क्या असर पड़ेगा?

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ऐसा नहीं है कि समस्या का कारण किसी को पता नहीं है लेकिन समाधान के नाम पर प्रचार ज़्यादा है। इस बीच आपकी संपत्ति बर्बाद होती रहेगी। पूरे जीवन की कमाई पानी में बहता रहेगा। यह एक की कहानी नहीं है। करोड़ों लोगों की कहानी है। लोगों ने लिख कर बोल कर अपना जीवन खपा दिया कि जलवायु संकट और ख़राब सिस्टम लोगों को ग़रीब बनाता है। विस्थापित करता है और उन्हें मार देता है।
आप भी भूल कर हिन्दू मुस्लिम और जाति की पहचान की लड़ाई में ताकतवर बनने चले जाते हैं। पहचान की राजनीति से दुकान चलती है। कुछ लोगों की दुकान।जिस सिस्टम में प्रतिनिधित्व के नाम पर पहचान की दुकान चलाई जाती है वह सिस्टम भीतर से सड़ गया है। सिस्टम के भीतर लोग वसूली के लिए जमा होते हैं या फिर थोड़ा कर दिखाने के बाद बाक़ी हड़प जाने के लिए। पहचान की राजनीति के नाम पर भारत में हर जाति का एक गिरोह बना हुआ है। जो अपनी जयकार कराता है और दूसरे को ब्लैकमेल करता है। जाति की इन दुकानों में कभी भी आप इन सवालों पर चिन्ता नहीं देखेंगे।
बाक़ी आप समझदार हैं। हमारे भी बीस तीस साल निकल गए। आपके भी पचास साल निकलेंगे।

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