14 और 15 मई फिलिस्तीनियों के लिए क्यों है मातम का दिन,फ़िलिस्तीनियों पर इस दिन क्या हुआ था?

नक़बा दिवस 15 मई को हर साल मनाया जाता है, इसी दिन से एक दिन पहले यानि 14 मई को फिलिस्तीन की ज़मीन पर पर यहूदी मुल्क इस्राइल बना था. फ़लस्तीनियों की त्रासदी की शुरूआत भी उसी दिन से हो गई थी.फ़लस्तीनी लोग इस घटना को 14 मई के बजाय 15 मई को याद करते हैं. वो इसे साल का सबसे दुखद दिन मानते हैं. 15 मई को वो ‘नकबा’ का नाम देते हैं. नकबा का अर्थ है ‘विनाश’. ये वो दिन था जब उनसे उनकी ज़मीन छिन गई थी.

बता दें की 15 मई 2020 को 72 वां नक़बा डे है और यह नक़बा डे इसी तारीख को मनाया जाता है क्यों की 15 मई 1948 के दिन ही फ़िलिस्तीन की ज़मीन पर अरब-इज़रायल युद्ध के दौरान अरबों की ज़मीन पर क़ब्ज़े के साथ इज़राइल अस्तित्व में आया और उसी दिन से फ़िलिस्तीनियों पर अत्याचार और निर्ममता की शुरुआत हुई।उसके साल भर बाद 1949 की शुरुआत में, इज़राइल राज्य की स्थापना के लगभग एक साल बाद, 15 मई को पूर्वी तट के कई शहरों (जॉर्डन के शासन में) को प्रदर्शनों, हड़ताल, काले झंडे उठाने, और दौरान मारे गए लोगों की क़ब्रों की यात्रा के रूप में चिह्नित किया गया और फ़िलस्तीनियो ने अपनी ज़मीन पर जबरन बसाए गए इज़रायल के ख़िलाफ आवाज़ उठानी शुरू की। विरोध प्रदर्शनों के ये कार्यक्रम मानवाधिकार कार्यकर्ता और छात्र संघों, सांस्कृतिक संस्थाओं और स्पोर्ट्स क्लबों, स्काउट्स क्लबों, शरणार्थियों की समितियों और मुस्लिम ब्रदरहुड द्वारा आयोजित किए जाने लगे।

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1950 के दशक के उत्तरार्ध में, 15 मई को अरब दुनिया में फ़िलिस्तीन दिवस के रूप में जाना जाने लगा जिसका उल्लेख अरब और मुस्लिम देशों में मीडिया ने फ़िलिस्तीन के साथ अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता के दिन के रूप में किया है और तब से ये दिन पूरी दुनिया में ‘आपत्ति दिवस’ के रूप में तथा इज़रायल के ज़ुल्म के ख़िलाफ़ काला दिवस के रूप में मनाया जाता है, जिसे अरबी में ‘अल-नक़बा’ कहा जाता है। 15 मई को फ़िलिस्तीनी जनता साल का सबसे दुखद दिन मनाती है जिसे वो ‘नक़बा’ कहती है। नक़बा का अर्थ है ‘विनाश’, या ‘तबाही’ ये वो दिन था जब फ़िलिस्तीनियों से उनकी ज़मीन छिन गई और विगत 71 साल से वे अपने मातृभूमि की स्वाधीनता के लिऐ संघर्ष कर रहे हैं। नक़बा यानी विनाश के दिन की शुरुआत विधिवत रूप से 1998 में फ़िलस्तीनी क्षेत्र के तत्कालीन राष्ट्रपति यासिर अराफ़ात ने की थी। 15 मई 1948 के दिन साढ़े सात लाख फ़िलस्तीनी,इज़राइली सेना के बढ़ते क़दमों की वजह से घरबार छोड़ कर भागे या जबरन हिंसा के बल पर भगाए गए थे। कइयों ने ख़ाली हाथ ही अपना घरबार छोड़ दिया था। कुछ घरों पर ताला लगाकर भाग निकले। यही चाबियां बाद में इस दिन के प्रतीक के रूप में सहेज कर रखी गईं।

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उस दुनिया के सामने मानवता पर एक ऐसा प्रहार हुआ था जिसकी टीस आज भी दुनिया भर के मानवता प्रेमी और मानवाधिकार के नैतिक मूल्यों को समझने वाले महसूस करते हैं जब भूमध्य सागर के पूर्वी तट पर स्थित पश्चिमी एशिया के फ़िलिस्तीन से उसके मूल निवासियों को बेघर कर के नस्ल परस्ती की बुनियाद पर स्थापित एक ज़ायोनिस्ट राज्य की अवैध स्थापना की गयी थी फ़िलस्तीनियों को हिंसा के बल पर उनके ही देश से निकाल दिया गया और बेघर फ़िलिस्तीनी पूर्वी तट, ग़ाज़ा पट्टी और फ़िलिस्तीन के पड़ोसी देशों में शरणार्थी बना दिए गए। इस वीभत्स घटना को वैश्विक इतिहास में फ़िलिस्तीनियों द्वारा अपने घरों से निर्मम विस्थापन के स्मरणोत्सव के तौर पर दर्ज कर दिया गया।
यूँ तो फ़िलिस्तीनियों के कैलेंडर में कई दिन प्रतीकात्मक महत्व रखते हैं जैसे 30 मार्च को भूमि दिवस के रूप में याद किया जाता है जिसकी एक अलग कहानी है और पवित्र रमज़ान में अंतिम शुक्रवार को यौम अल क़ुदस मनाया जाता है, लेकिन नक़बा दिवस का इतिहास फ़िलिस्तीनियों के अतीत की वो कहानी है कि इज़रायल के संस्थापकों में से एक और फ़िलिस्तीन के प्रथम प्रधानमंत्री डेविड बेन गोरियन ने कहा था फ़िलिस्तीनी बूढ़े मर जाएंगे और उनकी नई पीढ़ियाँ इसे भूल जाएंगी लेकिन फ़िलिस्तीनियों ने अपने इतिहास को कभी भुलाया नहीं और न ही उनके हौसले कभी पस्त हुए हैं और वो अपने अधिकारों के लिए निरंतर संघर्ष कर रहे हैं। विगत 70 सालों से अधिक समय से अपनी ही धरती पर फ़िलिस्तीनी जनता यहूदियों और सह्यूनियों के अत्याचार और ज़ुल्म का शिकार हो रहे हैं जिसका सबसे बड़ा कारण शहर येरूशलम पर इस्राइलियों का कब्ज़ा है और फ़िलिस्तीनियों के द्वारा न केवल स्वतंत्र फ़िलिस्तीनी राष्ट्र का अस्तित्व मायने रखता है बल्कि येरुशलम में मस्जिद ए अक़सा की हिफ़ाज़त भी वो अपना नैतिक दायित्व समझते हैं क्यूंकि पूरी दुनिया के मुसलामानों की आस्था उससे है।

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फ़िलिस्तीन की तरफ़ एक बार नज़र उठाइये जहाँ सात दशकों से अधिक का समय बीत चूका है और 1948 में जब ब्रिटेन अमेरिका और कुछ अन्य यूरोपीय देशों की साम्राज्यवादी पूंजीवादी शक्तियों ने सत्ता और दौलत अहंकार के नशे में चूर हो कर अरब शहंशाहों की ख़ामोश हिमायत के साथ पूरी दुनिया से यहूदियों को जबरन पूरी दुनिया से जमा कर के अरब की सरज़मीं पर अवैध रूप से क़ब्ज़ा कर बसा दिया और उस भू भाग को इज़राइल का नाम दिया गया।

उससे पहले फ़िलिस्तीन एक सार्वभौमिक राष्ट्र था जो ऑटोमन साम्राज्य के पतन के बाद ब्रिटेन के अधीन हो गया था। ग्रेट ब्रिटेन ने फ़िलिस्तीन में अपने अधिकारों का उपयोग दोहरी राजनीति के अन्तर्गत किया। एक तरफ़ उसने उसने प्रथम विश्व-युद्ध के समय अरबों से यह वायदा किया कि युद्ध में विजय के बाद फ़िलिस्तीन को अरब राष्ट्रों के साथ मिला दिया जायेगा और अरब तुर्क शासन से मुक्त हो सकेंगे और इसी वादे के आधार पर ऑटोमन साम्राज्य के विरुद्ध अरबों का इस्तमाल किया और दूसरी तरफ़ पूरी दुनिया यहूदी समाज को भी ग्रेट बिटेन ने फिलिस्तीन में बसने का निमन्त्रण दे दिया क्योंकि उस पर संयुक्त राज्य अमरीका की सरकार व उसके यहूदी समाज का दबाव पड़ रहा था। विश्व के यहूदियों ने इस आमंत्रण रुपी घोषणा को फिलिस्तीन उन्हें सौंपने का ब्रिटिश वायदा मान लिया और दुनिया भर से यहूदी फिलिस्तीन में आकर बसने व बसाये जाने लगे।

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यहीं से इस्राईल को अरबों की ज़मीन पर जबरन स्थापित करने की प्रष्ठभूमि की शुरुआत हुई। पहले विश्व युद्ध के बाद फ़िलिस्तीन में एक नई सरकार का गठन हुआ, इस दौरान बड़ी संख्या में फ़िलिस्तीन में यहूदी शरण लेने लगे, यहाँ इस समय यहूदियों की कुल आबादी सिर्फ 3 फ़ीसदी थी, लेकिन अगले तीस साल में यह बढ़कर 30 फीसदी तक पहुंच गई और जर्मनी में होलोकास्ट के बाद तो सारे विश्व से यहूदी फिलिस्तीन की ओर भागने लगे, क्योंकि उन्हें लगने लगा था अगर उन्हें जीवित रहना है तो फ़िलिस्तीन ही उन्हें आसरा दे सकता है।लेकिन उस आसरे को फ़िलिस्तीनियों की कमज़ोरी समझ कर उन्हें ही उनकी ज़मीन से बेदख़ल करने वाले इज़राइलियों के ख़िलाफ़ आज पूरी दुनिया में घृणा और नफ़रत है।

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पूरी दुनिया में निरंतर फ़लस्तीनियों के हिमायतियों का दायरा बढ़ रहा है संयुक्त राष्ट्र संघ में अमेरिका और इज़रायल कोशिशों के बावजूद फ़िलिस्तीन समर्थक देशों की संख्या बढ़ रही है और आज जहाँ फ़िलिस्तीन और इज़रायल से संबंधित किसी मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र संघ में वोटिंग होने पर फ़िलिस्तीन को मिलने वाली वोटों की संख्या सैकड़ों में होती है तो इज़रायल को मिले मत तीस चालीस से अधिक नहीं होते। पूरी दुनिया में अमेरिका और इज़रायल की साम्राज्य वादी और पूंजीवादी नीतियों के विरुद्ध विरोध के स्वर मुखर हो रहे हैं और अब तक स्तिथि यहाँ तक हो चुकी है की ख़ुद अमेरिका और इज़रायल की धरती पर फ़िलिस्तीन समर्थकों की संख्या में वृद्धि होती जा रही है वहाँ अपने ही शासकों के विरुद्ध आमजनमानस में असंतोष पनप रहा है लेकिन अंकल साम और अन्य यूरोपीय पूंजीवादी शक्तियाँ अमन और शान्ति की ठेकेदारी का बीड़ा उठाये फ़िलिस्तीनियों के उजड़ते आशियानों को देख कर अट्टहास लगा रही हैं।

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