इस्लाम में ज़कात क्या है और यह किसे दिया जाता है ?

ज़कात इस्लाम मे एक प्रकार का दान देना है,इस्लाम धर्म के अनुसार यह पाँच मूल स्तम्भो में से एक माना जाता है जिससे हर मुसलमान जो ज़कात की शरायत पूरी करता हो उसे अपने धन में से ज़कात की अदायगी जरूरी है जो फ़र्ज़ भी है,इस्लाम के पवित्र ग्रन्थ कुरआन पाक के मुताबिक हर एक मुसलमान को हर साल माहे रमज़ान में अपनी आमदनी का 2.5%हिस्सा गरीबो को दान में देना चाहिए हम अपनी भाषा मे इस दान को ज़कात कहते है।

इस पर तफ़्सीर से हमारे साथ बात करते हुए मदरसा सुल्तानुल उलूम सोसाइटी व मदरसा आमिना लिलबनात मुहल्ला सलारगंज बहराइच के प्रबंधक मौलाना सिराज अहमद मदनी ने बताया कि ज़कात इस्लाम के बुनियादी रुक्नों में से एक है जो दो हिजरी में फ़र्ज़ हुई,क़ुरआन ए करीम में 72 जगहों पर ज़कात देने का हुक्म दिया गया है जो ज़कात के महत्व को बताता है कि ज़कात ईमान और तक़वा(परहेजगारी) की अलामत(निशानी)है,ज़कात अदा करने वाला जन्नत उल फिरदौस का वारिस है।ज़कात अदा करने से माल पाक होकर महफूज रहता है।इसको अदा करने से रूहानियत सुकून के साथ-साथ बुरे अखलाक से निजात मिलती है,ज़कात अदा करने से दौलत कुछ मालदार लोगो के हाथों में रहने के बजाय समाज के सभी लोगो मे गर्दिश करती है।इससे मालदार और फकीर के बीच मोहब्बत होती है।ज़कात से समाज मे गरीबी खत्म होती है।राहे खुदा में एक रुपये खर्च करने का बड़ा ही शवाब है,असल मे यह ज़कात इंसानियत को आबाद करने का जरिया है।

उन्होंने कहा कि हर जमाने और समाज मे लोगो के जिंदगी गुजरने का स्तर एक तरह नही रहा है कोई अमीर तो कोई गरीब और कोई खुशहाल तो कोई तंगदस्ती में अपनी जिंदगी बसर करता है यह कुदरती निज़ाम है।ज़कात एक ऐसा जरिया है जिससे एक वर्ग दूसरे वर्ग के काम आने के साथ उसकी जरूरत पूरी कर सके।इसीलिए समाज के कमजोर लोगो की कैसी मदद करनी चाहिए यह बात भी खुद खालिक ए कायनात ने बता दी है और इसके लिए इस्लाम मे ज़कात का निज़ाम कायम किया गया है।ज़कात का असल मक़सद ये है कि ज़रूरतमंदों की मदद करके उन्हें भी ज़कात देने के लायक़ और क़ाबिल बनाना.

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