जब भी बहुसंख्यकवादी प्रवृत्तियां सिर उठायें तो इस पर सवाल उठाया जाना चाहिए: जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने शनिवार को कहा कि सरकार की चुनावी वैधता के बावजूद संविधान के अनुरूप राज्य की प्रत्येक कार्रवाई का आकलन किया जाना चाहिए.

उन्होंने यह भी कहा कि हमारे संवैधानिक वादे की पृष्ठभूमि के तहत बहुसंख्यकों प्रवृत्तियों पर सवाल उठाया जाना चाहिए.

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, ‘अधिनायकवाद, नागरिक स्वतंत्रता पर रोक, लैंगिकवाद, जातिवाद, धर्म या क्षेत्र के आधार पर भेदभाव खत्म करना, पवित्र वादा है, जो भारत को संवैधानिक गणराज्य के रूप में स्वीकार करने वाले हमारे पूर्वजों से किया गया था.

वह अपने पिता जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ की 101वीं जयंती पर शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाली महाराष्ट्र की संस्था शिक्षण प्रसार मंडली (SPM) द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में संविधान के रक्षक के रूप में छात्र विषय पर बोल रहे थे. जस्टिस चंद्रचूड़ भारत के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले मुख्य जस्टिस थे.

उन्होंने कहा कि भारत एक संवैधानिक गणतंत्र के रूप में 71वें वर्ष में है. कई अवसरों पर यह महसूस किया जा सकता है कि देश का लोकतंत्र अब नया नहीं है और संवैधानिक इतिहास का अध्ययन करने और इसके ढांचे के साथ जुड़ने की आवश्यकता उतनी सार्थक नहीं है.

उन्होंने कहा, यह पहचानना महत्वपूर्ण है कि शांति या संकट के समय में सरकार की चुनावी वैधता के बावजूद संविधान के अनुरूप राज्य की प्रत्येक कार्रवाई का आकलन करना होगा.

उन्होंने कहा कि भारत राज्य के अनुचित हस्तक्षेप के बिना, एक राष्ट्र के रूप में धार्मिक स्वतंत्रता, लिंग, जाति या धर्म के बावजूद व्यक्तियों के बीच समानता, अभिव्यक्ति और आवाजाही की मौलिक स्वतंत्रता जैसी कुछ प्रतिबद्धताओं और अधिकारों के वादे के दम पर एकजुट है. यह जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का स्थायी अधिकार है.

उन्होंने कहा, ‘बहुसंख्यकों प्रवृत्तियां जब भी और जैसे भी सिर उठाती हैं, तब उस पर हमारे संवैधानिक वादे की पृष्ठभूमि के तहत सवाल उठाया जाना चाहिए.

जस्टिस चंद्रचूड़ ने डॉ. भीमराव आंबेडकर को याद किया और कहा कि जातिवाद, पितृसत्ता और दमनकारी हिंदू प्रथाओं के खिलाफ लड़ाई शुरू करने से पहले, उनका पहला संघर्ष शिक्षा तक पहुंच प्राप्त करना था.

उन्होंने SPM द्वारा संचालित शिक्षण संस्थान के छात्रों को संबोधित करते हुए कहा, एक अछूत दलित महार जाति के एक व्यक्ति के रूप में बाबा साहेब ने प्राथमिक शिक्षा तक पहुंच प्राप्त करने में काफी संघर्ष किया.

उन्होंने कहा, स्कूली शिक्षा की उनकी सबसे महत्वपूर्ण यादें अपमान और अलगाव से जुड़ी हैं, जहां उन्हें कक्षा के बाहर बैठकर पढ़ाई करनी पड़ती थी. यह सुनिश्चित किया जाता था कि वह उच्च जाति के छात्रों से संबंधित पानी या नोटबुक न छू पाएं.

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि आंबेडकर ने अंतत: 26 डिग्रियां और उपाधियां प्राप्त कीं. वह अपनी पीढ़ी के सबसे उच्च शिक्षित भारतीयों में से एक बन गए. उन्होंने शिक्षा केवल आत्म-उन्नति के लिए हासिल नहीं की बल्कि उन्होंने अपनी परिवर्तनकारी क्षमता के दम पर संविधान पर अपनी छाप छोड़ी.

उन्होंने कहा कि आंबेडकर की तरह भारत और दुनिया में कई क्रांतिकारियों जैसे सावित्रीबाई फुले, ज्योतिबा फुले, नेल्सन मंडेला और यहां तक ​​कि मलाला यूसुफजई ने अपने मुक्ति आंदोलनों के जरिये शिक्षा के लिए एक क्रांतिकारी खोज की शुरुआत की.

उन्होंने कहा, ये कहानियां उपयोगी अनुस्मारक हैं कि आज हमारे पास शिक्षा का विशेषाधिकार, सबसे साहसी संघर्षों का फल है और हमारे पूर्वजों के सपनों का प्रतिनिधित्व करता है.

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि उनका दृढ़ विश्वास है कि छात्र मौजूदा प्रणालियों और पदानुक्रमों पर सवाल उठाने के लिए अपने प्रारंभिक वर्षों का उपयोग करके प्रगतिशील राजनीति और संस्कृतियों की शुरुआत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने कहा, प्रौद्योगिकी की तरह संविधान भी वैश्वीकरण और निजीकरण की भविष्यवाणी नहीं कर सका जो हम आज देख रहे हैं. संविधान ने हमारे नए स्वतंत्र राज्य की परिकल्पना हमारे समाज के प्रमुख अभिनेता, नियोक्ता और विकासकर्ता के रूप में की थी. स्वाभाविक रूप से हमारे कई मौलिक अधिकार और गारंटी, उनके शाब्दिक अर्थों में, हमें राज्य के संभावित अत्याचार से बचाने की कोशिश करते हैं.

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, हालांकि संवैधानिक भावना व्यक्तियों को उनके रूपों के बावजूद, सत्तावादी शक्ति संरचनाओं से बचाने का प्रयास करती है.

उन्होंने कहा, यह पहचानना महत्वपूर्ण है कि सरकार की चुनावी वैधता के बावजूद शांति या संकट के समय में संविधान एक उत्तरी सितारा है, जिसके खिलाफ हर राज्य की कार्रवाई या निष्क्रियता की अनुरूपता का न्याय करना होगा.

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि संविधान ने हमें न केवल औपनिवेशिक प्रजा से मुक्त नागरिकों में बदल दिया, बल्कि जाति, पितृसत्ता और सांप्रदायिक हिंसा की दमनकारी व्यवस्थाओं से त्रस्त एक राज्य का सामना करने की एक बड़ी चुनौती भी ली.

यह बताते हुए कि संविधान एक मृत पत्र नहीं है, उन्होंने कहा कि 1950 में तैयार किया गया दस्तावेज आज हमारे जीवन के अनुकूल नहीं होगा यदि हम इसे मृत पत्र के रूप में मानेंगे, बल्कि उसे वास्तविकताओं के मूल्यांकन के लिए एक कठोर सूत्र के रूप में लागू करना होगा.

एकता के अधिकार का फैसला संविधान को नींव के रूप में मान्यता देना था
जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने शनिवार को कहा कि निजता के अधिकार को अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार’ के एक अनिवार्य घटक के रूप में नामित करने का उनका 2017 का फैसला संविधान को एक नींव के रूप में मान्यता देना था, जिस पर आने वाली पीढ़ियों का निर्माण हो.

24 अगस्त, 2017 को नौ-न्यायाधीशों की पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए निजता के अधिकार को संविधान के तहत मौलिक अधिकार घोषित किया था. इस निर्णय में जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा था कि ‘निजता मानव गरिमा का संवैधानिक मूल है.

उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के खिलाफ नागरिक समाज में सबसे मजबूत आवाजों में से एक ग्रेटा थनबर्ग ने अपनी यात्रा की शुरुआत 15 साल की उम्र में स्वीडिश संसद के बाहर बैठकर ग्लोबल वार्मिंग के आसन्न जोखिमों के खिलाफ सरकारी कार्रवाई की मांग से की.

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, उनका और कई अन्य लोगों का उदाहरण हमें यह बताता है कि कोई भी इतना छोटा या इतना महत्वहीन नहीं है कि एक बड़ा बदलाव न ला सके.’

उन्होंने कहा, उच्चतम न्यायालय के फैसले में मेरा निष्कर्ष, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार के एक अनिवार्य घटक के रूप में निजता के अधिकार को मान्यता देना था, जिस पर आने वाली पीढ़ियों का निर्माण हो.

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